Supreme Court on Airfare: त्योहारों का सीजन हो या कोई आपात स्थिति, आम आदमी के लिए हवाई सफर अब जेब पर भारी ही नहीं, बल्कि ‘असहनीय’ होता जा रहा है। निजी एयरलाइंस द्वारा किरायों में की जाने वाली मनमानी बढ़ोतरी के खिलाफ अब देश की सर्वोच्च अदालत ने मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा बेहद गंभीर है और एयरलाइंस द्वारा यात्रियों का शोषण किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “यह गंभीर चिंता का विषय”
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि यह मुद्दा जनहित से गहराई से न जुड़ा होता, तो अदालत अनुच्छेद 32 के तहत इस पर सुनवाई ही नहीं करती। कोर्ट ने पूर्व में (19 जनवरी को) भी यह टिप्पणी की थी कि त्योहारों के दौरान किरायों में बेहिसाब बढ़ोतरी यात्रियों के खुले शोषण के समान है।
याचिका के मुख्य बिंदु: केवल किराया ही नहीं, सुविधाओं में भी कटौती
अदालत में दायर जनहित याचिका में निजी एयरलाइंस की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं:
- डायनेमिक प्राइसिंग का दुरुपयोग: त्योहारों और संकट के समय (जैसे प्राकृतिक आपदा या दंगे) एयरलाइंस किरायों को सामान्य से कई गुना बढ़ा देती हैं।
- अतिरिक्त शुल्क का बोझ: टिकट की मूल कीमत के अलावा यात्रियों पर कई तरह के अतिरिक्त शुल्क थोपे जा रहे हैं।
- बैगेज सीमा में कटौती: याचिका में आरोप लगाया गया है कि इकोनॉमी क्लास में मुफ्त चेक-इन बैगेज की सीमा को 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दिया गया है, जो यात्रियों की सुविधाओं पर सीधा प्रहार है।
- रेगुलेशन की मांग: याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इन उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त नियामक दिशानिर्देश (Regulatory Guidelines) बनाए जाएं।
केंद्र सरकार का पक्ष: “सक्रिय विचार जारी”
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने अदालत को आश्वासन दिया कि नागर विमानन मंत्रालय (Ministry of Civil Aviation) इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रहा है। सरकार ने अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय की मांग की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
अगली सुनवाई और समय सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई अब 23 मार्च को होगी। यात्रियों को उम्मीद है कि इस सुनवाई के बाद हवाई किरायों की ‘कैपिंग’ (अधिकतम सीमा तय करना) को लेकर कोई ठोस निर्णय निकलकर सामने आएगा।
यह मामला न केवल यात्रियों की जेब से जुड़ा है, बल्कि यह विमानन क्षेत्र में ‘फेयर प्रैक्टिस’ और उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।































