देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर चल रही दशकों पुरानी बहस में अब न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि “देश में यूसीसी लागू करने का समय अब आ गया है।” हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस पर अंतिम निर्णय लेना और कानून बनाना पूरी तरह से विधायिका (संसद) का अधिकार क्षेत्र है।
शरीयत कानून को चुनौती: महिलाओं के साथ भेदभाव का मुद्दा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ 1937 के ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट’ के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका का आधार: याचिका में आरोप लगाया गया है कि शरीयत के विरासत संबंधी नियम मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं और उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम अधिकार देते हैं।
अदालत का रुख: जस्टिस बागची ने स्वीकार किया कि “भेदभाव का मुद्दा काफी मजबूत है”, लेकिन उन्होंने न्यायिक मर्यादा का पालन करते हुए इसे संसद की शक्ति बताया।
‘कानूनी खालीपन’ की चेतावनी: क्यों मुश्किल है शरीयत को रद्द करना?
सुनवाई के दौरान बेंच ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु की ओर इशारा किया। कोर्ट ने कहा कि अगर शरीयत के विरासत कानून को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के रद्द कर दिया जाता है, तो देश में एक ‘कानूनी खालीपन’ (Legal Vacuum) पैदा हो जाएगा।
कारण: फिलहाल मुस्लिम विरासत को नियंत्रित करने वाला कोई दूसरा अलग वैधानिक कानून मौजूद नहीं है।
समाधान: कोर्ट के अनुसार, इस खालीपन को केवल यूसीसी जैसा एक व्यापक कानून ही भर सकता है, जिसे बनाने की शक्ति केवल देश की संसद के पास है।
“विधायिका पर भरोसा”: न्यायपालिका की लक्ष्मण रेखा
जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान साफ किया कि न्यायपालिका को विधायी शक्ति पर भरोसा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालतों का काम कानूनों की व्याख्या करना है, न कि नए कानून बनाना। यूसीसी जैसे संवेदनशील और व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले विषय पर संसद को ही पहल करनी होगी।
सुनवाई के प्रमुख बिंदु: एक नजर में
बेंच के सदस्य सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आर महादेवन
मुख्य टिप्पणी यूसीसी लागू करने का समय आ गया है।”
बड़ी चिंता विरासत कानून रद्द होने पर पैदा होने वाली ‘कानूनी शून्यता’।
संवैधानिक स्थिति यूसीसी बनाना संसद का अधिकार है, न्यायपालिका का नहीं।
अगली सुनवाई अब से 4 सप्ताह बाद।
गेंद अब संसद के पाले में
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह यूसीसी की आवश्यकता को महसूस करता है, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए। लेकिन ‘कानूनी शून्यता’ का हवाला देकर कोर्ट ने यह भी जता दिया है कि इस बदलाव के लिए एक व्यवस्थित कानूनी ढांचे की जरूरत है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है।
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