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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘रूह अफज़ा’ को माना फ्रूट ड्रिंक, अब लगेगा सिर्फ इतना पर्सेंट वैट

रूह अफज़ा
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देश के लोकप्रिय शरबत ब्रांड रूह अफज़ा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने हमदर्द (वक्फ) लैबोरेटरीज के उत्पाद ‘रूह अफज़ा’ को फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट की श्रेणी में रखते हुए इस पर 12.5 प्रतिशत के बजाय केवल 4 प्रतिशत वैट (VAT) लगाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया गया, जिसमें इस पर अधिक कर लगाने की बात कही गई थी।

यह निर्णय उत्तर प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट, 2008 (UP VAT Act) के तहत टैक्स वर्गीकरण से जुड़े लंबे विवाद का अंत करता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और फैसला

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि कई राज्यों में रूह अफज़ा को पहले से ही रियायती कर दर के दायरे में रखा गया है, जिससे हमदर्द की दलील मजबूत होती है। अदालत ने माना कि उत्पाद को फ्रूट ड्रिंक के रूप में वर्गीकृत करना न तो बनावटी है और न ही गलत, बल्कि यह व्यावसायिक रूप से मान्य और वास्तविक व्याख्या है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रूह अफज़ा को अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 103 के तहत फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। इसलिए संबंधित आकलन वर्षों में इस पर 4 प्रतिशत की रियायती वैट दर लागू होगी।

क्या था पूरा विवाद?

मामला उत्तर प्रदेश वैट कानून के तहत रूह अफज़ा के टैक्स क्लासिफिकेशन से जुड़ा था। विवाद इस बात पर था कि क्या इस उत्पाद को शेड्यूल-II के तहत 4 प्रतिशत टैक्स योग्य फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फूड माना जाए या शेड्यूल-V की रेसिड्यूरी एंट्री के तहत 12.5 प्रतिशत टैक्स योग्य अनक्लासिफाइड वस्तु माना जाए।

असेसमेंट ईयर 2007-08 और 2008-09 के लिए हमदर्द ने रूह अफज़ा की बिक्री पर 4 प्रतिशत की दर से वैट जमा किया था। कंपनी का तर्क था कि यह उत्पाद प्रोसेस्ड या प्रिजर्व्ड फल, फ्रूट स्क्वैश, फ्रूट ड्रिंक और फ्रूट जूस की श्रेणी में आता है। हालांकि टैक्स अधिकारियों ने इसे अनक्लासिफाइड कमोडिटी मानते हुए 12.5 प्रतिशत वैट लागू करने का निर्णय लिया।

फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी और कमर्शियल टैक्स ट्रिब्यूनल ने भी हमदर्द की अपील खारिज कर दी थी। ट्रिब्यूनल का कहना था कि आम और व्यावसायिक भाषा में रूह अफज़ा को फ्रूट ड्रिंक नहीं बल्कि शरबत के रूप में समझा जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

जुलाई 2018 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए हमदर्द की समीक्षा याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने ‘कॉमन पार्लेंस टेस्ट’ यानी आम बोलचाल के आधार पर कहा था कि यदि कोई ग्राहक फ्रूट जूस या फ्रूट ड्रिंक मांगता है तो उसे रूह अफज़ा नहीं दिया जाएगा।

इस फैसले को हमदर्द ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और टैक्स अधिकारियों के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालतों के निष्कर्ष कानून की गलत व्याख्या और फिस्कल क्लासिफिकेशन के स्थापित सिद्धांतों के गलत उपयोग पर आधारित थे।

फैसले का असर

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद रूह अफज़ा पर केवल 4 प्रतिशत वैट लगेगा, जिससे कंपनी को वित्तीय राहत मिलेगी। यह फैसला टैक्स वर्गीकरण से जुड़े अन्य मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

रूह अफज़ा को लेकर चला लंबा कानूनी विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ समाप्त हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्पाद की व्यावसायिक पहचान और वास्तविक संरचना को ध्यान में रखते हुए उसे फ्रूट ड्रिंक की श्रेणी में रखना उचित है। इस फैसले से न केवल हमदर्द को राहत मिली है, बल्कि टैक्स कानूनों की व्याख्या के संबंध में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित हुई है।

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