पश्चिम एशिया के युद्ध ने अब भारतीय उद्योग जगत की कमर तोड़नी शुरू कर दी है। देश के प्रमुख वाहन निर्माण केंद्रों (Automobile Hubs) में एलपीजी, कच्चे माल और जरूरी पुर्जों की भारी किल्लत के चलते उत्पादन ठप होने की नौबत आ गई है। स्थिति इतनी गंभीर है कि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पूरी तरह चरमरा गई है, जिससे न केवल बड़ी कंपनियां बल्कि उनसे जुड़े हजारों लघु उद्योग भी बर्बादी की कगार पर हैं।
1. ‘जस्ट इन टाइम’ मॉडल पड़ा भारी, पुर्जों का स्टॉक खत्म
वाहन निर्माता कंपनियां आमतौर पर ‘जस्ट इन टाइम’ (Just-in-Time) इन्वेंट्री मॉडल पर काम करती हैं, जिसके तहत उनके पास पुर्जों का केवल एक सप्ताह का स्टॉक होता है।
* सप्लाई चेन टूटी: लघु उद्योगों (SMEs) से आने वाले कलपुर्जों की आपूर्ति बंद होने के कारण अब बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों को अपना उत्पादन 40% से 60% तक घटाना पड़ रहा है।
* कच्चे माल का संकट: युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय रसद (Logistics) प्रभावित होने से जरूरी पुर्जों का आयात रुक गया है।
2. एलपीजी की किल्लत: भट्ठियां हुईं ठंडी
औद्योगिक उत्पादन में एलपीजी एक अनिवार्य ईंधन है, विशेषकर कास्टिंग और पेंटिंग जैसे महत्वपूर्ण चरणों में।
* उत्पादन पर ब्रेक: गैस की भारी कमी के कारण फैक्ट्रियों की भट्ठियां ठंडी पड़ रही हैं।
* सरकारी सक्रियता: संकट की गंभीरता को देखते हुए राज्य के उद्योग विभाग ने उन सभी उद्योगों का डेटा जुटाना शुरू कर दिया है जो पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर हैं। विकास आयुक्त ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उच्च स्तरीय बैठक कर स्थिति के तत्काल मूल्यांकन के निर्देश दिए हैं।
3. रिवर्स माइग्रेशन: कामगारों का गांवों की ओर पलायन
इस औद्योगिक संकट का सबसे मानवीय और दर्दनाक पहलू लेबर मार्केट में दिख रहा है।
* घरेलू गैस का संकट: केवल फैक्ट्रियों में ही नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर भी गैस की भारी किल्लत है।
* पलायन की आहट: काम कम होने और रहने-खाने की बढ़ती मुश्किलों के चलते उत्तर भारतीय कामगारों ने एक बार फिर अपने गांवों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। औद्योगिक क्षेत्रों से मजदूरों का यह पलायन आने वाले समय में ‘लेबर शॉर्टेज’ का बड़ा संकट खड़ा कर सकता है।
4. अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा
ऑटोमोबाइल सेक्टर भारत की जीडीपी में बड़ा योगदान देता है। यदि उत्पादन इसी तरह प्रभावित रहा, तो आने वाले हफ्तों में वाहनों की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और हजारों नौकरियां दांव पर लग सकती हैं। उद्योग जगत अब सरकार से आपातकालीन हस्तक्षेप और ईंधन की वैकल्पिक व्यवस्था की गुहार लगा रहा है।






























