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बस्तर में नक्सलवाद का अंत करीब: 25 लाख के इनामी ‘पापा राव’ समेत 18 खूंखार नक्सलियों का आत्मसमर्पण

बस्तर
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छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के जंगलों में तीन दशकों से दहशत का पर्याय बना माओवादी नेटवर्क अब पूरी तरह ढहने की कगार पर है। केंद्र सरकार द्वारा नक्सलवाद के पूर्ण सफाए के लिए तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन से महज 6 दिन पहले, सुरक्षाबलों को एक ऐसी कामयाबी मिली है जिसे ‘युद्ध का निर्णायक मोड़’ कहा जा रहा है।

मंगलवार को माओवादियों के सबसे पुराने और वरिष्ठ कमांडर पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ पुलिस के सामने हथियार डाल दिए। आत्मसमर्पण करने वालों में 11 पुरुष और 7 महिला नक्सली शामिल हैं।

पापा राव: संगठन की वो ‘जड़’ जो अब उखड़ गई
पापा राव पर छत्तीसगढ़ सरकार ने 25 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। वह केवल एक लड़ाका नहीं, बल्कि माओवादियों की ‘दंडकारण्य स्टेट जोनल कमेटी’ (DKSZC) का कद्दावर सदस्य और पश्चिम बस्तर डिवीजन का प्रभारी था।

* जड़ें फैलाने वाला रणनीतिकार: पापा राव ने ही सुकमा और बीजापुर जैसे दुर्गम इलाकों में संगठन का आधार तैयार किया था।
* बड़ी बरामदगी: सरेंडर के साथ ही नक्सलियों ने 8 एके-47 (AK-47) राइफलें और भारी मात्रा में विस्फोटक पुलिस को सौंपे हैं, जो उनकी सैन्य शक्ति के खत्म होने का प्रमाण है।
डेडलाइन के करीब ‘मिशन क्लीन’

केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को जड़ से मिटाने का लक्ष्य रखा था। अफसरों के मुताबिक, अब डेडलाइन में सिर्फ 6 दिन बचे हैं और पापा राव के आत्मसमर्पण के बाद नक्सलियों के बड़े गिरोह लगभग खत्म हो चुके हैं।
* बदलता बस्तर: सुरक्षाबलों के कड़े दबाव और विकास कार्यों के कारण अब नक्सली कैडर में भारी निराशा है।
* अंतिम प्रहार: वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि बचे-कुचे छोटे समूहों को भी अगले कुछ दिनों में मुख्यधारा में लाने या खत्म करने के लिए ऑपरेशन तेज कर दिए गए हैं।

नक्सली नेटवर्क को बड़ा झटका क्यों?
* नेतृत्व का संकट: पापा राव जैसे पुराने और अनुभवी कमांडर का जाना माओवादी विचारधारा के लिए ‘ताबूत की आखिरी कील’ साबित होगा।
* आत्मबल का टूटना: 7 महिला नक्सलियों का एक साथ सरेंडर करना यह दर्शाता है कि अब जंगलों के भीतर सुरक्षा और भविष्य के प्रति भारी अनिश्चितता है।
* हथियारों की कमी: 8 एके-47 का हाथ से जाना नक्सलियों की मारक क्षमता को शून्य की ओर ले जाएगा।
प्रशासन का संदेश: “सरकार की ‘पुनर्वास नीति’ और ‘विकास की राह’ से प्रभावित होकर नक्सली अब हथियार छोड़ रहे हैं। बस्तर अब बंदूकों की गूँज से नहीं, बल्कि विकास के गीतों से पहचाना जाएगा।

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