वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की जीवनरेखा कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव एक नए और निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। ईरान के कड़े रुख और सैन्य तेवरों के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पीछे हटने के बाद अब दुनिया की नजरें ब्रिटेन पर टिकी हैं। होर्मुज में जारी ईरानी नाकाबंदी को खत्म कराने की जिम्मेदारी अब लंदन ने अपने कंधों पर ले ली है।
ट्रम्प का यू-टर्न: “हमें होर्मुज की जरूरत नहीं”
ईरान द्वारा होर्मुज की घेराबंदी को खुलवाने में विफल रहने के बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से अमेरिका को इस संकट से बाहर करते हुए कहा:
अमेरिका को अब होर्मुज जलडमरूमध्य की आवश्यकता नहीं है। जिन देशों का तेल और गैस यहाँ से गुजरता है, अब यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे इसकी चिंता करें और अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करें।”
ट्रम्प का यह रुख ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसने एशियाई और यूरोपीय देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
ब्रिटेन की ‘सॉफ्ट पावर’ डिप्लोमेसी: 35 देशों का जमावड़ा
अमेरिका के पीछे हटने के तुरंत बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने मोर्चा संभाला। उन्होंने होर्मुज संकट के समाधान के लिए 35 देशों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। इस पहल का उद्देश्य एक बहुराष्ट्रीय गठबंधन बनाना है जो समुद्री व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान कर सके।
* फ्रांस का समर्थन: फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ब्रिटेन की इस पहल का पुरजोर समर्थन किया है। मैक्रों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता के लिए यूरोपीय देशों को एकजुट होना होगा।
भारत की भूमिका: संतुलन और संवाद
भारत के लिए होर्मुज का रास्ता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। गुरुवार को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा लिया।
* ईरान से सीधा संपर्क: भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत इस मुद्दे पर ईरान के साथ निरंतर संपर्क में है।
* राहत की खबर: भारत ने बताया कि 28 फरवरी के बाद होर्मुज से भारत के एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) के 6 टैंकर सुरक्षित रूप से पास हुए हैं, जो भारत की कूटनीतिक सफलता को दर्शाता है।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और एक बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। यदि यहाँ नाकाबंदी लंबे समय तक चलती है, तो वैश्विक बाजार में ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।
निष्कर्ष: होर्मुज जलडमरूमध्य अब केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि महाशक्तियों के दबदबे की परीक्षा बन गया है। जहाँ अमेरिका ने अपने हाथ खींच लिए हैं, वहीं ब्रिटेन की अगुवाई में बना नया गठबंधन और भारत की संतुलित कूटनीति ही यह तय करेगी कि दुनिया की ‘एनर्जी लाइफलाइन’ फिर से कब बहाल होती है।
एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है: क्या बिना अमेरिकी सैन्य शक्ति के, ब्रिटेन और उसके सहयोगी देश ईरान को झुकने पर मजबूर कर पाएंगे?





























