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ट्रम्प का ‘टैरिफ प्रहार’: अमेरिकी बाजार में पेटेंटेड दवाओं पर 100% ड्यूटी, क्या भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए खतरे की घंटी?

ट्रम्प
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डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को धार देते हुए वैश्विक फार्मा जगत में खलबली मचा दी है। ट्रंप प्रशासन ने पेटेंटेड दवाओं पर 100% टैरिफ लगाने का बड़ा ऐलान किया है। यह कदम न केवल वैश्विक दवा व्यापार के समीकरण बदल देगा, बल्कि भारत जैसे बड़े फार्मा निर्यातक देशों के लिए भी एक नई चिंता का सबब बन गया है।

क्या है नया टैरिफ नियम?
ट्रम्प सरकार का यह सख्त आदेश उन देशों और कंपनियों पर लक्षित है जिन्होंने अमेरिकी हितों के अनुरूप समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। नए नियमों के अनुसार, यह 100% टैरिफ उन देशों की कंपनियों पर लागू होगा जिन्होंने:

* रीशोरिंग कॉन्ट्रैक्ट (Reshoring Contract): यानी अपना उत्पादन अमेरिका में शिफ्ट करने का अनुबंध नहीं किया है।
* MFN प्राइसिंग डील: स्वास्थ्य विभाग के साथ ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) मूल्य निर्धारण का समझौता नहीं किया है।

डेडलाइन: कंपनियों के पास कितना समय?
प्रशासन ने कंपनियों को तैयारी के लिए दो अलग-अलग समय सीमाएं दी हैं:
* बड़ी कंपनियां: इनके लिए नया नियम 31 जुलाई 2026 से प्रभावी होगा।
* छोटी कंपनियां: इन्हें थोड़ी राहत देते हुए 29 सितंबर 2026 तक का समय दिया गया है।
भारत पर असर: जेनेरिक दवाओं का ‘सुरक्षा कवच’ कब तक?

भारत के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि जेनेरिक दवाओं को इस टैरिफ से अभी बाहर रखा गया है। भारतीय फार्मा निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा जेनेरिक दवाएं ही हैं। लेकिन बाजार विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर गहरी आशंका है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है।

चिंता के मुख्य बिंदु:
* उत्पादन ट्रांसफर का दबाव: यदि भारतीय कंपनियां अमेरिका में अपना प्रोडक्शन बेस (रीशोरिंग) स्थानांतरित नहीं करती हैं, तो भविष्य में उनके जेनेरिक उत्पादों पर भी टैरिफ की तलवार लटक सकती है।
* लागत में भारी वृद्धि: 100% टैरिफ का सीधा मतलब है दवा की कीमतों का दोगुना हो जाना। इससे पेटेंटेड दवाओं के बाजार में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता लगभग खत्म हो सकती है।
* आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान: ‘रीशोरिंग’ के दबाव के कारण कंपनियों को भारी निवेश कर अमेरिका में प्लांट लगाने होंगे, जिससे उनके वैश्विक मुनाफे पर असर पड़ेगा।

ट्रम्प का यह ‘टैरिफ वॉर’ शुद्ध रूप से अमेरिकी विनिर्माण को बढ़ावा देने और दवा की कीमतों पर नियंत्रण पाने की एक आक्रामक कोशिश है। हालांकि भारत का जेनेरिक सेक्टर अभी सुरक्षित है, लेकिन “उत्पादन अमेरिका ले जाओ या टैक्स भरो” की यह नीति भविष्य में भारतीय फार्मा दिग्गजों के लिए बड़ी चुनौती पेश करने वाली है। आने वाले महीनों में भारतीय वाणिज्य मंत्रालय और फार्मा लॉबी की प्रतिक्रिया इस युद्ध की दिशा तय करेगी।

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