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होर्मुज जलडमरूमध्य से तुर्की के तेल जहाजों की आवाजाही जारी, जानें तनाव के बीच ईरान का ये फैसला क्यों खास है?

होर्मुज जलडमरूमध्य
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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक दिलचस्प और अहम घटनाक्रम सामने आया है। जहां एक ओर ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष तेज होता जा रहा है और अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर हमलों की खबरें हैं, वहीं दूसरी ओर तुर्की के तेल जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जा रही है।

क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने हालिया तनाव और सैन्य गतिविधियों के बावजूद तुर्की के तेल टैंकरों को होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजरने दिया। ये वही जलमार्ग है, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल की सप्लाई होती है। ऐसे समय में, जब क्षेत्र में किसी भी तरह की समुद्री नाकेबंदी वैश्विक ऊर्जा संकट को जन्म दे सकती है, ईरान का ये कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

एक तरफ हमले, दूसरी तरफ राहत

ईरान पर आरोप है कि उसने हाल ही में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इससे क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। लेकिन इसी बीच तुर्की के जहाजों को छूट देना ये संकेत देता है कि ईरान अपनी रणनीति को पूरी तरह से आक्रामक नहीं बनाना चाहता।

तुर्की को छूट क्यों?

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे राजनयिक संबंध, जिसके तहत तुर्की और ईरान के बीच अपेक्षाकृत संतुलित संबंध रहे हैं। दूसरा है आर्थिक हित, यानी कि तेल व्यापार दोनों देशों के लिए अहम है, इसलिए सप्लाई चेन को बाधित करना ईरान के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है, और रणनीतिक संतुलन, मतलब ईरान शायद ये दिखाना चाहता है कि उसका संघर्ष सीमित है और वो वैश्विक व्यापार को पूरी तरह बाधित नहीं करना चाहता।

वैश्विक असर क्या हो सकता है?

गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक है। यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में ईरान द्वारा तुर्की को दी गई ये छूट अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए राहत की खबर मानी जा रही है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान का ये कदम एक संतुलित रणनीति की ओर इशारा करता है। जहां वो अपने विरोधियों पर दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं अपने सहयोगी देशों के साथ संबंध भी मजबूत बनाए रखना चाहता है। आने वाले दिनों में ये देखना दिलचस्प होगा कि ये संतुलन कब तक कायम रहता है और इसका वैश्विक राजनीति पर क्या असर पड़ता है।

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