उद्धव ठाकरे की ‘अग्निपरीक्षा’: महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर ‘मातोश्री’ के इर्द-गिर्द अटकलों का बाजार गर्म है। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे का विधान परिषद (MLC) का कार्यकाल 13 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि सीट खाली हो रही है, बल्कि सवाल यह है कि क्या उद्धव दोबारा सदन में कदम रखेंगे? और अगर हाँ, तो क्या सहयोगी दल उनका रास्ता आसान करेंगे?
कार्यकाल का अंत और बदलता समीकरण
उद्धव ठाकरे ने 14 मई 2020 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद विधान परिषद की सदस्यता ग्रहण की थी। अब 6 साल का यह सफर अपने अंतिम पड़ाव पर है।
- खाली होने वाली सीटें: कुल 9 सीटें।
- चुनौती: मौजूदा विधानसभा में संख्या बल की स्थिति ऐसी है कि कोई भी दल अकेले दम पर उम्मीदवार जिताने की स्थिति में नहीं दिख रहा है।
शरद पवार और कांग्रेस: ‘किंगमेकर’ की भूमिका
उद्धव ठाकरे की दोबारा एंट्री पूरी तरह से महाविकास अघाड़ी के तालमेल पर टिकी है।
- समर्थन की अनिवार्यता: राकांपा (शरद पवार गुट) और कांग्रेस के वोटों के बिना उद्धव के लिए राह कांटों भरी है।
- सीटों का बंटवारा: 9 सीटों के लिए होने वाले इस चुनाव में एमवीए के भीतर यह तय करना एक बड़ी चुनौती होगी कि कौन सी सीट किस दल के कोटे में जाएगी। क्या सहयोगी दल अपने कोटे की सीट उद्धव के लिए छोड़ेंगे? यह अघाड़ी की एकजुटता का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट होगा।
उपस्थिति का रिकॉर्ड: विपक्ष का ‘हथियार’
उद्धव ठाकरे के लिए राह सिर्फ गणितीय रूप से ही कठिन नहीं है, बल्कि नैतिक रूप से भी कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। विधानमंडल सचिवालय के आंकड़े उनकी कार्यशैली पर विपक्षी हमलों को धार दे सकते हैं:
- सदन में गैरहाजिरी: दिसंबर 2023 से मार्च 2024 के बीच सदन 57 दिन चला, जिसमें उद्धव केवल 17 दिन उपस्थित रहे।
- 40 दिनों की अनुपस्थिति: मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सदन में उनकी कम रुचि को विपक्षी दल मुद्दा बना सकते हैं, जो उनकी दोबारा उम्मीदवारी पर सवाल खड़े कर सकता है।
| विवरण | सांख्यिकी / तिथि |
|---|---|
| कार्यकाल समाप्ति | 13 मई 2026 |
| कुल खाली सीटें | 09 |
| सदन में उपस्थिति | 17 दिन (कुल 57 में से) |
| अनुपस्थिति | 40 दिन |
उद्धव की दुविधा: नेतृत्व या सक्रिय राजनीति?
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि उद्धव सदन में रहकर पार्टी की आवाज बुलंद करें, लेकिन खुद उद्धव ने अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं।
- रणनीति: क्या वे खुद चुनाव लड़ेंगे या अपने किसी वफादार को आगे कर संगठन पर ध्यान केंद्रित करेंगे?
- अस्तित्व की लड़ाई: 2026 का यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं है, बल्कि यह उद्धव ठाकरे की अपने सहयोगियों पर पकड़ और उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित होगा।
महाराष्ट्र की राजनीति अब उस दौर में पहुँच गई है जहाँ एक-एक वोट की कीमत सोने जैसी है। उद्धव ठाकरे के लिए विधान परिषद की यह ‘वापसी’ जितनी उनके व्यक्तिगत कद के लिए जरूरी है, उतनी ही महाविकास अघाड़ी के भविष्य के लिए निर्भर है।






























