बॉलीवुड एक्टर और कॉमेडियन राजपाल यादव का नाम एक समय उनकी कॉमिक टाइमिंग और दमदार एक्टिंग के लिए लिया जाता था, लेकिन साल 2012 में आई फिल्म ‘अता पता लापता’ उनके जीवन का ऐसा मोड़ बन गई जिसने उनकी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ दोनों को गहराई से प्रभावित किया। ये फिल्म उनके लिए केवल एक प्रोजेक्ट नहीं थी, बल्कि एक सपना और रचनात्मक प्रयोग था। हालांकि, यही फिल्म आगे चलकर आर्थिक विवाद और कानूनी परेशानी का कारण बनी।
फिल्म से राजपाल यादव को थी काफी उम्मीदें
‘अता पता लापता’ को राजपाल यादव ने एक अलग तरह के सिनेमा के रूप में पेश करने की कोशिश की थी। उनका मानना था कि ये फिल्म पारंपरिक बॉलीवुड फॉर्मेट से हटकर बनाई गई है। उन्होंने एक बातचीत में बताया था कि इस फिल्म में दो-चार नहीं बल्कि करीब 170 कलाकार शामिल थे, जिनमें अधिकतर थिएटर पृष्ठभूमि से आए कलाकार थे। फिल्म में असरानी, ओम पुरी, आशुतोष राणा, मनोज जोशी, गोविंद नामदेव, विजय राज, विक्रम गोखले, दारा सिंह और सत्यदेव दुबे जैसे दिग्गज कलाकारों ने भी काम किया। राजपाल यादव का कहना था कि ये अपने तरह की पहली फिल्म थी जिसमें फोरग्राउंड में संगीत और बैकग्राउंड में ड्रामा चलता है। वो इसे एक देसी ब्रॉडवे शैली का सिनेमा मानते थे।
इस फिल्म को बनाने का विचार उनके मन में कई वर्षों तक रहा। उन्होंने बताया था कि स्क्रिप्ट लिखने से पहले उन्होंने इस कहानी को सैकड़ों बार अपने दिमाग में गढ़ा और परखा। उनका उद्देश्य एक ऐसी फिल्म बनाना था जो अर्थपूर्ण भी हो, उद्देश्यपूर्ण भी और साथ ही मनोरंजक भी। लंबे समय तक थिएटर और फिल्मों में काम करने के बाद वो एक ऐसा प्रयोग करना चाहते थे जो अलग पहचान बनाए। उनका मानना था कि इतने बड़े और अलग विषय पर शायद ही कोई निर्माता जोखिम उठाता, इसलिए उन्होंने खुद इस फिल्म को बनाने का निर्णय लिया।
दिलचस्प है फिल्म के नाम की कहानी
फिल्म के नाम की कहानी भी दिलचस्प है। राजपाल यादव के अनुसार, एक दिन बातचीत के दौरान उनके एक मित्र ने मजाक में “अता पता लापता” शब्द कहा और उन्हें ये शीर्षक तुरंत पसंद आ गया। इसके बाद उन्होंने कोई दूसरा नाम सोचने की कोशिश भी नहीं की। उन्हें लगा कि यही नाम फिल्म की भावना को सही तरीके से दर्शाता है।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी मानव चतुर्वेदी नामक किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका रोल खुद राजपाल यादव ने निभाया। कहानी में एक व्यक्ति अपने घर के अचानक गायब हो जाने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराता है। मामला अजीब मोड़ लेता है और शक उसी व्यक्ति पर आ जाता है कि उसने बीमा की रकम पाने के लिए खुद ही अपना घर गिरवा दिया। मीडिया और प्रशासन के दबाव के बीच कहानी आगे बढ़ती है और सत्ता व्यवस्था तथा नौकरशाही की खामियों पर व्यंग्य करती है। ये फिल्म सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने पर आधारित एक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति थी।
क्यों जेल जाना पड़ा राजपाल यादव को?
हालांकि, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी। फिल्म निर्माण के दौरान वर्ष 2010 में राजपाल यादव ने M/s Murali Projects Pvt. Ltd. नाम की कंपनी से लगभग पांच करोड़ रुपये लिए थे। आरोप था कि ये रकम ब्याज सहित लौटानी थी। फिल्म की असफलता के बाद आर्थिक संकट गहराया और कंपनी की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई कि दिए गए चेक बाउंस हो गए हैं। मामला अदालत तक पहुंचा और इसी कानूनी प्रक्रिया के चलते राजपाल यादव को जेल भी जाना पड़ा।
राजपाल यादव ने अपने पक्ष में कहा था कि ये रकम कर्ज नहीं बल्कि निवेश थी। उनके अनुसार, फाइनेंसर अपने पोते को फिल्म में लॉन्च करना चाहते थे और ये एक निवेश समझौता था। उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने किसी तरह की धोखाधड़ी नहीं की और ये पूरा प्रोजेक्ट एक रचनात्मक प्रयोग था। उनके लिए ‘अता पता लापता’ केवल एक फिल्म नहीं बल्कि सीख और अनुभव का माध्यम थी।
इस पूरे घटनाक्रम ने ये दिखाया कि फिल्म इंडस्ट्री में रचनात्मक जोखिम कभी-कभी भारी आर्थिक परिणाम भी लेकर आ सकते हैं। राजपाल यादव आज भी खुद को एक अभिनेता मानते हैं और इस फिल्म को अपनी जिंदगी का अहम अध्याय बताते हैं। ‘अता पता लापता’ भले ही व्यावसायिक रूप से सफल न रही हो, लेकिन ये उनके करियर की सबसे चर्चित और विवादित फिल्मों में जरूर शामिल हो गई।
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