महाराष्ट्र की राजनीति आज उस मोड़ पर खड़ी है, जहां हर कुछ महीनों में नई राजनीतिक तस्वीर सामने आ जाती है। कभी सरकार गिरती है, कभी पार्टी टूटती है और कभी पुराने साथी आमने-सामने खड़े नजर आते हैं। सवाल ये है कि आखिर महाराष्ट्र में राजनीतिक स्थिरता क्यों नहीं टिक पा रही?
शिवसेना का टूटना: एक पार्टी, दो सत्ता केंद्र
महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव तब आया, जब शिवसेना दो गुटों में बंट गई। एक ओर उद्धव ठाकरे रहे, तो दूसरी ओर एकनाथ शिंदे सत्ता के साथ खड़े नजर आए। ये सिर्फ पार्टी का विभाजन नहीं था, बल्कि राजनीतिक नैतिकता और जनादेश को लेकर भी बड़ा सवाल बन गया। इस घटनाक्रम ने ये दिखा दिया कि अब पार्टियों से ज्यादा ताकत विधायकों की संख्या में सिमट गई है।
एनसीपी में दरार और पवार राजनीति
शिवसेना के बाद एनसीपी में हुआ विभाजन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए दूसरा बड़ा झटका था। शरद पवार जैसे अनुभवी नेता और उनके भतीजे अजित पवार के अलग-अलग रास्तों पर जाने से ये साफ हो गया कि अब राजनीतिक मतभेद सार्वजनिक होने लगे हैं। ये विभाजन सत्ता संतुलन से ज्यादा भरोसे के संकट की ओर इशारा करता है।
बीजेपी की भूमिका: सत्ता में रहकर परदे के पीछे
इन टूट-फूट के बीच बीजेपी ने खुद को निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित किया। पार्टी ने मुख्यमंत्री पद भले न लिया हो, लेकिन सरकार के गठन और संचालन में उसकी भूमिका सबसे प्रभावी बनी रही। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी ने महाराष्ट्र में सहयोगी राजनीति का नया मॉडल पेश किया है।
आम मतदाता के मन में क्या चल रहा है?
सबसे बड़ा सवाल जनता के भरोसे का है। जिस पार्टी को वोट दिया गया, वही पार्टी सत्ता में नहीं दिखती। इस स्थिति ने मतदाता को उलझन में डाल दिया है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी असर पड़ता नजर आता है।
क्या ये भविष्य की राजनीति का संकेत है?
महाराष्ट्र का अनुभव बताता है कि आने वाले समय में राजनीति और ज्यादा अस्थिर, लेकिन रणनीतिक हो सकती है। गठबंधन, टूट-फूट और दलबदल अब अपवाद नहीं, बल्कि नई सच्चाई बनते जा रहे हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति आज एक प्रयोगशाला बन चुकी है। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि जनता इस राजनीतिक संस्कृति को स्वीकार करती है या स्थिरता की मांग करती है।
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