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शिवसेना का शक्ति प्रदर्शन और कानूनी जंग: बालासाहेब की जयंती पर SC सुनाएगा ‘ऐतिहासिक’ फैसला?

शिवसेना
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महाराष्ट्र की राजनीति के लिए आने वाला 23 जनवरी का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाला है। एक ओर जहां पूरा राज्य शिवसेना संस्थापक हिंदुहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे की जयंती मना रहा होगा, वहीं दूसरी ओर देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर अंतिम और निर्णायक बहस शुरू होगी।

सुनवाई टली, अब 23 जनवरी पर टिकी निगाहें
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद पर सुनवाई होनी थी, लेकिन किन्हीं कारणों से इसे टाल दिया गया। कोर्ट ने अब 23 जनवरी सुबह 11 बजे का समय निर्धारित किया है। यह संयोग ही है कि इसी दिन बालासाहेब ठाकरे की जयंती भी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस दिन आने वाला फैसला या होने वाली बहस महाराष्ट्र की राजनीति की भविष्य की दिशा तय करेगी।

समय का कड़ा निर्धारण: 5 घंटे की आखिरी जंग
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों (उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट) के लिए सख्त समय सीमा तय की है:

  • दोनों गुटों के वकीलों को अपनी दलीलें पूरी करने के लिए कुल 5 घंटे का समय दिया गया है।
  • माना जा रहा है कि यह इस विवाद की आखिरी सुनवाई होगी, जिसके तुरंत बाद कोर्ट अपना फैसला सुरक्षित रख सकता है या सुना सकता है।

शिवसेना के साथ NCP विवाद पर भी होगा फैसला
अदालत केवल शिवसेना ही नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के भीतर चल रहे नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर भी अपना फैसला सुनाएगी। शरद पवार और अजीत पवार गुटों के बीच जारी इस कानूनी लड़ाई का अंत भी इसी सुनवाई के इर्द-गिर्द होने की संभावना है।

स्थानीय निकाय चुनावों पर प्रभाव
कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर महाराष्ट्र के लंबित स्थानीय निकाय चुनावों (Municipal Elections) पर पड़ेगा। यदि चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम पर स्थिति स्पष्ट हो जाती है, तो राज्य निर्वाचन आयोग के लिए चुनाव की राह साफ हो जाएगी। लंबे समय से टल रहे इन चुनावों के लिए राजनीतिक दल भी इस फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

OBC आरक्षण का मामला भी अधर में
शिवसेना विवाद के साथ-साथ बुधवार को महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव में OBC आरक्षण के मामले पर भी सुनवाई होनी थी। हालांकि, यह मामला भी सुनवाई के लिए पेश नहीं हो सका और इसे भी टाल दिया गया है। ओबीसी आरक्षण का मुद्दा ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के शक्ति संतुलन के लिए बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।

23 जनवरी को होने वाली यह सुनवाई केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के दो सबसे बड़े राजनीतिक परिवारों और दलों के अस्तित्व की लड़ाई है। क्या बालासाहेब की जयंती पर उनके उत्तराधिकार की यह जंग किसी मुकाम पर पहुंचेगी? यह देखना दिलचस्प होगा।

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