संपादकीय विश्लेषण: शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ ने अपने नवीनतम संपादकीय में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा प्रहार किया है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के हवाले से राहुल गांधी द्वारा संसद में उठाए गए मुद्दों को आधार बनाकर सरकार की ‘मजबूत नेतृत्व’ वाली छवि पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
सीमा पर संकट और नेतृत्व की विफलता
संपादकीय के अनुसार, 31 अगस्त, 2020 की रात जब चीनी टैंक भारतीय सीमा की ओर बढ़ रहे थे, तब देश का राजनीतिक नेतृत्व अनिर्णय की स्थिति में था। जनरल नरवणे के खुलासे का जिक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि जब सेना ने स्पष्ट आदेश मांगे, तो प्रधानमंत्री ने “जो उचित समझो वो करो” कहकर पल्ला झाड़ लिया।
- बुलबुला फूटा: सामना लिखता है कि 56 इंच की छाती का दावा करने वाला नेतृत्व राष्ट्रीय संकट के समय जिम्मेदारी सेना पर डालकर खुद पीछे हट गया।
- रणनीति का अभाव: लेख में आरोप लगाया गया है कि चीनी घुसपैठ को रोकने के लिए सरकार के पास कोई ठोस आकस्मिक योजना (Contingency Plan) नहीं थी।
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हमारा देश! pic.twitter.com/tNt2c06LuH— Sanjay Raut (@rautsanjay61) February 4, 2026
राहुल गांधी का प्रहार और संसद में गतिरोध
राहुल गांधी ने जब इस संवेदनशील मुद्दे को लोकसभा में उठाने की कोशिश की, तो सरकार ने चर्चा करने के बजाय सदन को स्थगित करना बेहतर समझा।
प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री का संसद से चले जाना यह दर्शाता है कि सरकार चीन के मुद्दे पर जवाब देने से डर रही है।”
सोनम वांगचुक और आंतरिक विरोधाभास
संपादकीय में लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की गई है।
- वांगचुक ने जब चीन द्वारा भारतीय भूमि पर कब्जे का दावा किया, तो उन्हें ‘देशद्रोही’ बताकर जेल भेज दिया गया।
- लेख का तर्क है कि जो व्यक्ति सेना के लिए सौर ऊर्जा के टेंट बनाता है, उसे गद्दार कहना और चीनी घुसपैठ पर चुप्पी साधे रखना सरकार की दोहरी नीति है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पहलगाम हमला
पहलगाम में २६ हिंदू पर्यटकों की हत्या के बाद शुरू हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की विफलता को भी नेतृत्व की कमजोरी बताया गया है। लेख के अनुसार, बदला पूरा होने से पहले ही सेना को पीछे हटने का आदेश देना नेतृत्व की दिशाहीनता का प्रमाण है।
मुख्य निष्कर्ष और कड़े सवाल
संपादकीय ने अंत में कुछ चुभते हुए सवाल किए हैं:
- चुनिंदा बहादुरी: नोटबंदी, जीएसटी और लॉकडाउन जैसे फैसलों में तत्परता दिखाने वाले प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा के समय ‘जो उचित हो वो करो’ मोड में क्यों चले जाते हैं?
- सुरक्षा की चिंता: जनरल नरवणे के खुलासे के बाद उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई है, साथ ही उन्हें ‘अंधभक्तों’ द्वारा निशाना बनाए जाने की आशंका प्रकट की गई है।
सामना का यह लेख प्रधानमंत्री मोदी के ‘मास्टर स्ट्रोक’ शब्द पर कटाक्ष करते हुए इसे देश की सुरक्षा के साथ एक खतरनाक प्रयोग करार देता है। लेख की मूल भावना यह है कि दिल्ली की सभाओं में दहाड़ना आसान है, लेकिन वास्तविक युद्ध जैसी स्थिति में निर्णय न लेना ‘देशद्रोह’ के समान है।































