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Mental Strength के दावों के बीच टूटते मेधावी, IIT संस्थानों में बढ़ता आत्महत्या का ग्राफ

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Mental Strength: देश के सबसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थानों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) से आने वाली खबरें परेशान करने वाली हैं। हाल ही में आईआईटी बॉम्बे में एक छात्र द्वारा की गई आत्महत्या ने उस समय गहरा सदमा पहुँचाया, जब संस्थान ने महज कुछ दिन पहले ही विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए ‘मानसिक सामर्थ्य सप्ताह’ (12-18 जनवरी) मनाया था। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि केवल कार्यक्रमों के आयोजन से छात्रों के अंतर्मन का बोझ कम नहीं हो रहा है।

खोखले साबित होते जागरूकता सप्ताह
आईआईटी बॉम्बे में छात्रों को एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन के गुर सिखाए गए थे, लेकिन इसके तुरंत बाद हुई त्रासदी ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सप्ताह भर के आयोजनों से कहीं ज्यादा जरूरी ‘सतत निगरानी’ और ‘भयमुक्त वातावरण’ है। जब छात्र शैक्षणिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसता है, तो औपचारिक सत्र उसे सहारा देने में विफल साबित हो रहे हैं।

आंकड़े जो डराते हैं: पिछले दो वर्षों का लेखा-जोखा
देशभर के विभिन्न आईआईटी परिसरों में पिछले दो वर्षों में कुल 31 विद्यार्थियों ने मौत को गले लगाया है। विभिन्न संस्थानों में हुई आत्महत्याओं का विवरण इस प्रकार है:

आपके द्वारा दिए गए डेटा के अनुसार, यहाँ इसे एक साफ़ और व्यवस्थित टेबल में प्रस्तुत किया गया है:

संस्थान (IIT)आत्महत्याओं की संख्या (पिछले 2 वर्ष)
कानपुर (IIT Kanpur)9
खड़गपुर (IIT Kharagpur)7
दिल्ली (IIT Delhi)3
रुड़की (IIT Roorkee)3
गुवाहाटी (IIT Guwahati)3
मुंबई (IIT Bombay)2
बीएचयू / धनबाद (IIT BHU / Dhanbad)1 + 1
मद्रास (IIT Madras)0

विशेषज्ञों की राय: ढांचागत सुधार की आवश्यकता
ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के संस्थापक धीरज सिंह (IIT कानपुर के पूर्व छात्र) के अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि सिस्टम की विफलता है। उन्होंने सुधार के लिए तीन प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया है:

  • स्पष्ट जवाबदेही: आत्महत्या की हर घटना के बाद संस्थान की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
  • प्रारंभिक चेतावनी तंत्र (Early Warning System): शिक्षकों और हॉस्टल वार्डन को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे छात्र के व्यवहार में आ रहे बदलावों को पहचान सकें।
  • स्वतंत्र समीक्षा: मानसिक स्वास्थ्य ढांचे का मूल्यांकन बाहरी और स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा किया जाना चाहिए, न कि केवल आंतरिक समितियों द्वारा।

दबाव का पहाड़ और अकेलापन
आईआईटी जैसे संस्थानों में प्रवेश पाना जितना कठिन है, वहां के शैक्षणिक दबाव को झेलना उससे भी चुनौतीपूर्ण है। कड़ी प्रतिस्पर्धा, ग्रेडिंग सिस्टम और कैंपस प्लेसमेंट की होड़ छात्रों को सामाजिक रूप से अलग-थलग कर देती है। जब छात्र अपने परिवार से दूर होते हैं, तो उन्हें एक ऐसे ‘सपोर्ट सिस्टम’ की जरूरत होती है जो उन्हें केवल एक ‘रोल नंबर’ नहीं बल्कि एक ‘इंसान’ के तौर पर देखे।

शिक्षा का उद्देश्य जीवन संवारना है, जीवन छीनना नहीं। यदि देश के शीर्ष संस्थान अपने सबसे होनहार दिमागों को सुरक्षित महसूस नहीं करा पा रहे हैं, तो हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलने की जरूरत है। ‘काउंसलिंग सेल’ को केवल कागजों तक सीमित न रखकर, छात्रों के बीच भरोसे का सेतु बनाना अनिवार्य है।

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