मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच तेज होता सैन्य टकराव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 5 मार्च 2026 तक 84 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुकी है, जो संघर्ष शुरू होने से पहले के मुकाबले काफी ऊंची है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये युद्ध लंबा खिंचता है तो दुनिया को बड़ा ऑयल शॉक झेलना पड़ सकता है, जिसका सबसे गहरा असर भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर पड़ेगा।
क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
मिडिल ईस्ट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। यहां बढ़ते तनाव के कारण तेल बाजार में भारी अस्थिरता आई है। हाल के हवाई हमलों, जहाजों की आवाजाही में रुकावट और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर खतरे के चलते कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर आपूर्ति में लंबी रुकावट हुई तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर से ऊपर भी जा सकता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है, क्योंकि दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे मार्ग से गुजरता है। ईरान की तरफ से दी गई चेतावनियों और जहाजों पर हमलों के डर से व्यावसायिक शिपिंग लगभग ठप हो गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है।
भारत पर बुरा असर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का 85-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। मिडिल ईस्ट से भारत की आधी से ज्यादा तेल आपूर्ति आती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल का सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत, महंगाई दर और रुपये पर पड़ता है। हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल सालाना हजारों करोड़ रुपये बढ़ सकता है। सरकार पहले से ही रूस, अमेरिका और अन्य स्रोतों से आयात बढ़ाने की कोशिश कर रही है, लेकिन लंबे समय तक रुकावट होने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।
चीन भी नहीं है अछूता
चीन जैसे अन्य एशियाई देश भी इसी संकट से जूझ रहे हैं। तेल कीमतों में तेजी से इन देशों की आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ सकता है। शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है और निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है। अगर मिडिल ईस्ट का संघर्ष और फैलता है या लंबा चलता है तो वैश्विक महंगाई, आर्थिक विकास में मंदी और बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका मजबूत हो रही है। आने वाले दिनों में पूरी दुनिया की नजर इस क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति पर टिकी रहेगी, क्योंकि छोटी-छोटी घटनाएं भी बड़े आर्थिक झटके दे सकती हैं।
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