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9 घंटे की देरी रेलवे को पड़ी भारी, Consumer Commission ने लगाया 35 हजार का मुआवजा

रेलवे

ट्रेन के घंटों देरी से पहुंचने से परेशान एक यात्री को उपभोक्ता आयोग से बड़ी राहत मिली है। झारखंड के सरायकेला जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने दक्षिण पूर्व रेलवे को यात्री को कुल 35,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि ट्रेन के करीब 9 घंटे की देरी से यात्री को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा।

ये मामला सितंबर 2024 का है, जब यात्री ने टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए इस्पात एक्सप्रेस में स्लीपर क्लास की दो टिकट बुक कराई थीं।

528 मिनट की देरी से संबलपुर पहुंची ट्रेन

ट्रेन को टाटानगर से सुबह 10:18 बजे रवाना होकर दोपहर 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था। लेकिन ट्रेन निर्धारित समय पर नहीं पहुंची और संबलपुर पहुंचने में उसे 528 मिनट यानी 8 घंटे 48 मिनट की देरी हुई।

लंबी देरी से परेशान यात्री ने पहले रेलवे अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा। इसके बाद उसने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई और 4.50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की।

रेलवे ने क्या दलील दी?

मामले की सुनवाई के दौरान रेलवे ने यात्री की शिकायत का विरोध किया। रेलवे की ओर से कहा गया कि यात्री ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया, जिससे ट्रेन की देरी के कारण हुए वास्तविक आर्थिक नुकसान को साबित किया जा सके।

रेलवे ने ये दलील भी दी कि इस मामले की सुनवाई उपभोक्ता आयोग के बजाय Railway Claims Tribunal Act, 1987 के तहत होनी चाहिए।

हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने रेलवे की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की शिकायत पर उपभोक्ता आयोग सुनवाई कर सकता है।

रेलवे ये साबित नहीं कर सका कि देरी मजबूरी थी

आयोग ने सुनवाई के दौरान ये भी पाया कि रेलवे ये साबित करने में विफल रहा कि ट्रेन की देरी ऐसी परिस्थितियों के कारण हुई थी, जो उसके नियंत्रण से पूरी तरह बाहर थीं।

आयोग के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश किए। लंबी देरी के कारण यात्री को हुई परेशानी को देखते हुए आयोग ने रेलवे को मुआवजा देने का आदेश दिया।

30 हजार रुपये मुआवजा और 5 हजार रुपये मुकदमे का खर्च

सरायकेला जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को यात्री को 30,000 रुपये मानसिक और अन्य परेशानियों के मुआवजे के तौर पर देने का निर्देश दिया है।

इसके अलावा 5,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने होंगे। इस तरह रेलवे को यात्री को कुल 35,000 रुपये का भुगतान करना होगा।

आयोग ने रेलवे को आदेश की तारीख से 45 दिनों के भीतर राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है। निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर बकाया राशि पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।

यात्रियों के लिए क्या मायने रखता है यह फैसला?

ये मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रेन की देरी से होने वाली परेशानी को लेकर यात्री ने उपभोक्ता आयोग का रुख किया और आयोग ने मामले में रेलवे की जवाबदेही पर विचार किया। हालांकि, हर ट्रेन की देरी पर स्वतः मुआवजा मिलना तय नहीं है। मामले के तथ्यों, देरी के कारण और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संबंधित आयोग या अदालत फैसला कर सकती है।

इस मामले में आयोग के आदेश के बाद अब दक्षिण पूर्व रेलवे को तय समयसीमा के भीतर यात्री को 35,000 रुपये का भुगतान करना होगा।

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