उत्तराखंड के पहाड़ों में विकास और प्रकृति के बीच का संघर्ष एक बार फिर डराने वाले मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। भारतीय रेलवे की महत्वाकांक्षी ‘ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना’ के तहत बन रही नरकोटा-सुमेरपुर सुरंग सोमवार रात एक भीषण हादसे का गवाह बनी। सुरंग के भीतर अचानक हुए भू-धंसाव ने न केवल पहाड़ की संवेदनशीलता को उजागर किया है, बल्कि निर्माण कार्य की सुरक्षा पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।आधी रात का खौफ: जब धंसने लगी पाताल तक जमीन
घटना सोमवार रात करीब 11:30 बजेकी है, जब सुरंग के भीतर शिफ्ट का काम जोर-शोर से चल रहा था। अचानक एक जोर की आवाज हुई और सुरंग का तल (Surface) देखते ही देखते 3 से 4 मीटर तक नीचे धंस गया।
अंधेरी सुरंग के भीतर इस धंसाव के साथ ही पहाड़ के अंदरूनी जल स्रोतों का रास्ता खुल गया और कुछ ही पलों में सुरंग का वह हिस्सा मलबे और पानी से लबालब भर गया।यह मंजर इतना डरावना था कि वहां मौजूद मशीनों का संतुलन बिगड़ने लगा। जांबाजी: 8 जिंदगियों को मिला ‘पुनर्जन्म’
गनीमत रही कि जैसे ही जमीन में कंपन और धंसाव शुरू हुआ, साइट पर मौजूद अलर्ट सिस्टम और सुपरवाइजरों ने तुरंत कार्रवाई की। सुरंग के भीतर फंसे 8 मजदूरों को बिना समय गंवाए सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अगर निकालने में 5 मिनट की भी देरी होती, तो यह हादसा उत्तरकाशी की सिल्कयारा सुरंग जैसी बड़ी त्रासदी में बदल सकता था।
विशेषज्ञों का जमावड़ा: क्या हिमालय दे रहा है अंतिम चेतावनी?
मंगलवार सुबह घटना की गंभीरता को देखते हुए 15 विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय टीम मौके पर पहुंची। इस टीम में भूगर्भ वैज्ञानिक और रेलवे के वरिष्ठ इंजीनियर शामिल थे। निरीक्षण के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आईं:
जियोलॉजिकल फॉल्ट: प्राथमिक जांच के अनुसार, सुरंग के उस खास हिस्से में कोई ‘सॉफ्ट रॉक’ (मुलायम पत्थर) या ‘वाटर पॉकेट’ हो सकता है, जो खुदाई के दबाव को सहन नहीं कर सका।
निर्माण पर रोक: फिलहाल सुरक्षा कारणों से सुमेरपुर सुरंग के भीतर सारा निर्माण कार्य अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया गया है।
भविष्य की रणनीति: विशेषज्ञों की टीम अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या सुरंग के डिजाइन में बदलाव की जरूरत है या इसे ‘ग्राउटिंग’ तकनीक से दोबारा स्थिर किया जा सकता है।
विकास की गति और पर्यावरण की ‘कीमत’
यह हादसा उस समय हुआ है जब उत्तराखंड पहले से ही जोशीमठ और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे भू-धंसाव के कारण संवेदनशील स्थिति में है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन (125 किमी लंबी) का अधिकांश हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरना है।
बड़े सवाल:
1. क्या सुरंग निर्माण के दौरान भारी विस्फोटकों का कंपन पहाड़ों की आंतरिक संरचना को खोखला कर रहा है?
2. क्या हिमालय की ‘कच्ची मिट्टी’ और जल निकासी का सही आकलन किया गया था?
नरकोटा-सुमेरपुर की यह घटना एक अलार्म है। भले ही 8 मजदूरों की जान बच गई हो, लेकिन पहाड़ के भीतर का यह ‘धंसाव’ आने वाले समय के लिए एक बड़ी चुनौती है। रेल विकास निगम (RVNL) के लिए अब यह केवल इंजीनियरिंग का मामला नहीं, बल्कि पर्यावरण और सुरक्षा के बीच तालमेल बिठाने की एक बड़ी परीक्षा है।
फिलहाल पूरे क्षेत्र में सन्नाटा है और विशेषज्ञ इस ‘धंसाव’ के कारणों की गहराई से जांच कर रहे हैं। मजदूरों के परिवारों ने राहत की सांस ली है, लेकिन डर अब भी पहाड़ों की इन सुरंगों में तैर रहा है।



























