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दहलीज पर युद्ध या कूटनीति की आखिरी सांस? ईरान-अमेरिका ‘सीजफायर’ में दो हफ्ते का ठहराव और तेहरान की कड़ी शर्तें

सीजफायर
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ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे परोक्ष और प्रत्यक्ष संघर्ष में एक नया मोड़ आया है। दो सप्ताह के लिए युद्धविराम की प्रक्रियाओं पर लगी रोक ने मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुँचा दिया है। यह ठहराव महज एक सैन्य विराम नहीं है, बल्कि कूटनीतिक बिसात पर चली गई एक ऐसी चाल है जिसके पीछे ईरान की कुछ ठोस और अपरिवर्तनीय माँगें छिपी हुई हैं।

ईरान की प्रमुख माँगें: तेहरान का ‘डिमांड चार्टर’
ईरान ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। यदि अमेरिका और उसके सहयोगी चाहते हैं कि क्षेत्र में शांति बनी रहे, तो ईरान इन प्रमुख बिंदुओं पर समझौता चाहता है:

1. प्रतिबंधों की पूर्ण समाप्ति (Lifting of Sanctions):
ईरान की सबसे पहली और बुनियादी माँग आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना है। ईरान का तर्क है कि जब तक उसकी अर्थव्यवस्था पर लगे ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (Maximum Pressure) वाले प्रतिबंध नहीं हटते, तब तक किसी भी स्थायी शांति वार्ता का कोई अर्थ नहीं है।

2. क्षेत्रीय संप्रभुता और विदेशी सेना की वापसी:
ईरान लगातार यह माँग कर रहा है कि इराक, सीरिया और खाड़ी देशों से अमेरिकी सेना की उपस्थिति कम या पूरी तरह खत्म की जाए। ईरान इसे अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानता है।

3. परमाणु कार्यक्रम पर गारंटी:
ईरान चाहता है कि भविष्य में कोई भी अमेरिकी प्रशासन 2018 की तरह परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा बाहर न निकले। तेहरान को इस बार ‘लिखित और कानूनी गारंटी’ चाहिए।

4. प्रतिशोध का अधिकार और सुरक्षा कवच:
हाल के वर्षों में अपने शीर्ष सैन्य कमांडरों और वैज्ञानिकों की हत्या के बाद, ईरान चाहता है कि उसकी सुरक्षा प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले और उसकी ‘डिटेरेंस’ (Deterrence) नीति में कोई हस्तक्षेप न हो।

दो हफ्ते का ‘पॉज’ क्यों?
यह 14 दिनों का समय दोनों पक्षों के लिए ‘री-ग्रुपिंग’ का वक्त है। विशेषज्ञों का मानना है कि:
ईरानअपनी आंतरिक राजनीति और सैन्य तैयारियों को परख रहा है।

अमेरिकाअपने सहयोगियों (इजरायल और खाड़ी देशों) के साथ नई रणनीति बना रहा है।
यह समय सीमा खत्म होने के बाद यदि कोई ठोस कूटनीतिक रास्ता नहीं निकला, तो क्षेत्रीय छद्म युद्ध (Proxy War) एक बड़े सीधे संघर्ष में बदल सकता है।

कूटनीति के मुहाने पर खड़ा मध्य पूर्व
ईरान की माँगें अमेरिका के लिए स्वीकार करना कठिन हैं, और अमेरिका की शर्तें ईरान के लिए अपनी संप्रभुता से समझौता करने जैसी हैं। अगले दो हफ्ते विश्व राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। क्या यह ‘सीजफायर’ का टूटना एक बड़े तूफान से पहले की शांति है, या बातचीत की मेज पर लौटने का आखिरी मौका? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वाशिंगटन तेहरान की इन सख्त मांगों पर क्या प्रतिक्रिया देता है।

शांति अब केवल गोलियों के रुकने का नाम नहीं है, बल्कि उन आर्थिक और राजनीतिक जंजीरों को तोड़ने की मांग है जिन्होंने दशकों से इस क्षेत्र को जकड़ रखा है।

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