ग्रामीण भारत में सरकारी सिस्टम कैसे काम करता है, ये सवाल अक्सर रिपोर्टों और भाषणों में दब जाता है। सरकारी काग़ज़ों में गांव को “लाभार्थी”, “लक्षित वर्ग” और “विकास का केंद्र” बताया जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है। जब गांवों में जाकर सिस्टम को करीब से देखा जाता है तो ये सवाल सामने आता है कि क्या सिस्टम सच में ग्रामीण भारत के लिए बना है, या ग्रामीण भारत किसी तरह सिस्टम को झेल रहा है। इस लेख में हम ग्रामीण भारत में प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और ज़मीनी सच्चाई के बीच के अंतर को समझने की कोशिश करेंगे।
काग़ज़ों में बना सिस्टम और ज़मीन पर उसकी हकीकत
सरकारी सिस्टम की नींव काग़ज़ों पर रखी जाती है। योजनाएं बनाई जाती हैं, आदेश जारी होते हैं, दिशा-निर्देश तय किए जाते हैं और फिर लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। ये पूरी प्रक्रिया दफ़्तरों में सुव्यवस्थित दिखाई देती है, लेकिन जैसे ही ये सिस्टम गांव तक पहुंचता है, इसकी दिशा बदलने लगती है। कई बार योजना का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है, प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और अंततः योजना सिर्फ़ फाइलों और रिपोर्टों तक सीमित होकर रह जाती है। ग्रामीण इलाकों में सिस्टम अक्सर समस्या का समाधान करने के बजाय केवल औपचारिकता निभाने वाला ढांचा बन जाता है।
ग्रामीण भारत में सिस्टम किनके ज़रिए चलता है
ग्रामीण भारत में सिस्टम सिर्फ़ सरकार या मंत्रालय तक सीमित नहीं होता। गांव के स्तर पर ये कुछ खास लोगों के ज़रिए चलता है। पंचायत प्रतिनिधि, पंचायत सचिव, रोजगार सेवक, आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता, साथ ही ब्लॉक और अंचल स्तर के अधिकारी इस व्यवस्था के मुख्य स्तंभ होते हैं। इन्हीं के माध्यम से तय होता है कि किसे सरकारी योजना का लाभ मिलेगा, किसका नाम सूची में शामिल होगा और किसे ये कहकर टाल दिया जाएगा कि अगली बार देखा जाएगा। यहीं से सिफारिश, पहचान और स्थानीय दबाव सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे पात्रता से ज़्यादा प्रभाव अहम हो जाता है।
सरकारी योजनाओं के बावजूद लाभ क्यों नहीं पहुंच पाता
भारत सरकार और राज्य सरकारों की ओर से ग्रामीण इलाकों के लिए आवास, पेंशन, राशन, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग इन योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। इसका कारण सिर्फ़ योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि सिस्टम की कमज़ोरियां हैं। कई लोगों तक योजनाओं की जानकारी नहीं पहुंच पाती। डिजिटल प्रक्रिया पर बढ़ती निर्भरता ने गांव के बुज़ुर्गों और गरीबों के लिए नई समस्याएं खड़ी कर दी हैं। अफसरशाही और ग्रामीण समाज के बीच दूरी आज भी बनी हुई है। स्थानीय राजनीति योजनाओं के वितरण को प्रभावित करती है और शिकायत तंत्र इतना कमजोर है कि लोग शिकायत दर्ज कराने से पहले ही निराश हो जाते हैं। ग्रामीण भारत में सिस्टम अक्सर उसी तक पहुंच पाता है जो बोल सकता है, दौड़ सकता है या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को जानता है।
डिजिटल सिस्टम: ग्रामीण भारत के लिए सुविधा या चुनौती
डिजिटल इंडिया के तहत सरकारी सिस्टम को ऑनलाइन और तेज़ बनाने का दावा किया गया। लेकिन ग्रामीण भारत में डिजिटल सिस्टम कई बार नई चुनौतियां लेकर आया। आधार लिंक न होने पर लाभ रुक जाता है, सर्वर डाउन होने पर काम ठप पड़ जाता है और मोबाइल या नेटवर्क न होने पर पहचान ही संकट में पड़ जाती है। गांवों में आज भी “नेटवर्क नहीं है” ये वाक्य कई सरकारी कामों को रोक देने के लिए काफ़ी होता है। डिजिटल व्यवस्था ने बिचौलियों को पूरी तरह खत्म नहीं किया, बल्कि कई मामलों में उनका रूप बदल दिया है।
ग्रामीण इलाकों में शिकायत प्रणाली क्यों कमजोर है?
ग्रामीण भारत में शिकायत दर्ज करने के लिए हेल्पलाइन, पोर्टल और आवेदन जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। लेकिन शिकायत का निपटारा आज भी बड़ी समस्या है। कई मामलों में महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता है, जवाब औपचारिक होते हैं और ज़िम्मेदारी तय नहीं होती। कई बार शिकायत करने वाला व्यक्ति ही सवालों के घेरे में आ जाता है, जिससे बाकी लोग सिस्टम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने से डरने लगते हैं।
कमियों के बावजूद सिस्टम चलता कैसे है?
ये सवाल अहम है कि अगर ग्रामीण सिस्टम में इतनी खामियां हैं तो वो चलता कैसे है। इसका जवाब ग्रामीण समाज की मजबूरी और उम्मीद दोनों में छिपा है। लोगों के पास विकल्प सीमित हैं, इसलिए वे सिस्टम से जुड़े रहते हैं। वे उम्मीद छोड़ना नहीं चाहते और हर गांव में कुछ ईमानदार कर्मचारी आज भी ऐसे हैं जो सीमित संसाधनों में भी काम करने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण भारत में सिस्टम न पूरी तरह फेल है और न ही पूरी तरह सफल। ये किसी तरह चलता रहता है।
ग्रामीण भारत में सिस्टम सुधारने के रास्ते
ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय करना ज़रूरी है। योजनाओं की भाषा को सरल बनाना होगा ताकि आम ग्रामीण नागरिक उन्हें समझ सके। डिजिटल प्रक्रिया के साथ-साथ ऑफलाइन विकल्प भी बनाए रखने होंगे। स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट को मजबूत करना होगा और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। सबसे ज़रूरी बात ये है कि ग्रामीण भारत को सिर्फ़ आंकड़ों और रिपोर्टों का हिस्सा नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक के रूप में देखा जाए।
गांव की आवाज़ के बिना सिस्टम अधूरा है
ग्रामीण भारत में सिस्टम ऊपर से नीचे अपने आप नहीं चलता। जब गांव से दबाव बनता है, तभी सिस्टम में हलचल होती है। जब तक ग्रामीण समाज की आवाज़ मज़बूत नहीं होगी और उसे गंभीरता से नहीं सुना जाएगा, तब तक विकास ज़्यादातर काग़ज़ों में ही सिमटा रहेगा।
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