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महाराष्ट्र की राजनीति 2026: सत्ता मजबूत, लेकिन सियासी ज़मीन खिसक रही है?

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महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। 2025 के अंत में हुए स्थानीय निकाय चुनावों और 2026 में प्रस्तावित बीएमसी चुनाव से पहले राज्य की सियासत में हलचल तेज़ हो गई है। सतह पर सत्ता पक्ष मजबूत दिखता है, लेकिन अंदरखाने समीकरण उतने सरल नहीं हैं। ये सिर्फ चुनावी गणित नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन, गठबंधन की मजबूरी और विपक्ष के अस्तित्व की लड़ाई है।

स्थानीय निकाय चुनावों ने क्या संकेत दिया?

नगर परिषद, नगर पंचायत और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों में महायुति गठबंधन ने बढ़त बनाई है। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) ने सहयोगी की भूमिका निभाई। इन नतीजों से एक बात साफ़ है, कि महाराष्ट्र में सत्ता पक्ष का संगठनात्मक नेटवर्क अब ज़मीनी स्तर तक मज़बूत हो चुका है।

बीजेपी: गठबंधन में भी सेंटर ऑफ पावर

स्थानीय चुनावों के बाद ये स्पष्ट हुआ है कि महायुति में केंद्र बिंदु बीजेपी ही है। चाहे सीट शेयरिंग हो या रणनीति, बड़े फैसलों की दिशा बीजेपी तय कर रही है। बीजेपी की ताकत अब सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित नहीं, बल्कि अर्ध-शहरी और कस्बाई क्षेत्रों में भी उसका असर बढ़ा है। ये आने वाले चुनावों के लिए बड़ा संकेत है।

बीएमसी चुनाव 2026: असली परीक्षा अभी बाकी

मुंबई महानगरपालिका चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा रण माना जाता है।
बीएमसी पर कब्ज़ा सिर्फ आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व का प्रतीक है।

कहना शायद गलत नहीं होगा कि 2026 के बीएमसी चुनाव में बीजेपी अपनी बढ़त को शहरी सत्ता में बदलना चाहती है। शिवसेना (शिंदे) मराठी वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखना चाहती है
और शिवसेना (उद्धव) के लिए ये अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। अब यही चुनाव तय करेगा कि “असली शिवसेना” की राजनीतिक पहचान किसके पास जाएगी।

महायुति के भीतर सब कुछ ठीक है?

सतह पर एकजुट दिखने वाली महायुति के भीतर तनाव की खबरें लगातार आती रही हैं।
सीट बंटवारे, श्रेय की राजनीति और नेतृत्व की भूमिका को लेकर मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

शिवसेना (शिंदे) अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती है, जबकि एनसीपी (अजित पवार) अभी भी संगठनात्मक स्थिरता की तलाश में है। कह सकते हैं कि ये गठबंधन फिलहाल सत्ता की ज़रूरत से जुड़ा है, विचारधारा की एकता से नहीं

विपक्ष: बिखरा हुआ, लेकिन खत्म नहीं

महा विकास अघाड़ी (MVA) – कांग्रेस, शिवसेना (UBT) और एनसीपी (शरद पवार) – स्थानीय चुनावों में कमजोर साबित हुई है। हालांकि कुछ इलाकों में आंशिक तालमेल दिखा, लेकिन राज्य स्तर पर कोई ठोस रणनीति सामने नहीं आई। वहीं अगर विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी की बात करें तो स्पष्ट नेतृत्व का अभाव, साझा नैरेटिव की कमी और जमीनी स्तर पर तालमेल का टूटना बड़ी समस्या है। फिर भी, बीएमसी और आने वाले चुनाव विपक्ष के लिए आखिरी बड़ा मौका हो सकते हैं।

बदलता वोटर, बदलती राजनीति

इन चुनावों ने ये भी दिखाया है कि महाराष्ट्र का वोटर बदल रहा है। अब सिर्फ भावनात्मक अपील या पहचान की राजनीति काफी नहीं है।

मतदाता अब पूछ रहा है –
काम क्या हुआ?
स्थिरता कौन दे सकता है?
स्थानीय स्तर पर कौन दिखता है?

यही सवाल आने वाले समय में सियासत की दिशा तय करेंगे।

आगे क्या? 2026 के बाद का रोडमैप

राज्य की राजनीति अब तीन मोर्चों पर आगे बढ़ेगी, जिनमें पहली है बीएमसी और बड़े नगर निगम चुनाव, दूसरी ज़िला परिषद और ग्रामीण सत्ता की लड़ाई और तीसरी है गठबंधन के भीतर नेतृत्व का संतुलन। ऐसे में अगर महायुति अंदरूनी मतभेद संभाल पाती है, तो उसका पलड़ा भारी रह सकता है। अगर नहीं, तो महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर अस्थिर लेकिन दिलचस्प दौर में प्रवेश कर सकती है।

2026 में महाराष्ट्र की राजनीति मजबूत सत्ता, कमज़ोर लेकिन जिंदा विपक्ष और ज्यादा सवाल पूछते मतदाता के बीच संतुलन खोज रही है। यकीनन ये तय है कि आने वाले दिनों में सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा तय करेंगे।

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