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New Horizons: आत्मबोध का शंखनाद, ‘इंडिया’ नहीं, ‘भारत’ ही हमारी पहचान

Mohan Bhagwat
Mohan Bhagwat

New Horizons: हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्र की पहचान और व्यक्तिगत जीवनशैली को लेकर एक अत्यंत गंभीर और विचारोत्तेजक विमर्श छेड़ा है। उनका तर्क सरल है लेकिन गहरा है: हम भारत के निवासी हैं, तो स्वयं को ‘इंडिया’ से क्यों जोड़ें? यह केवल नाम बदलने की बात नहीं है, बल्कि सदियों की मानसिक गुलामी से मुक्त होकर अपने स्वत्व (Self) को पहचानने का आह्वान है।

विशेष नाम का अनुवाद असंभव है
मोहन भागवत का मानना है कि सामान्य शब्दों का अनुवाद किया जा सकता है, लेकिन ‘विशेष संज्ञा’ (Proper Noun) का नहीं। जिस तरह किसी व्यक्ति का नाम हर भाषा में एक ही रहता है, उसी तरह हमारे देश का नाम ‘भारत’ है। यह नाम हमारी सभ्यता, संस्कृति और प्राचीन चेतना का प्रतीक है। पहचान बदली नहीं जा सकती, और इसे वैश्विक मंच पर भी गर्व के साथ ‘भारत’ के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

स्वदेशी: नारों से आगे, जीवन का हिस्सा
अक्सर ‘स्वदेशी’ को केवल आर्थिक संदर्भों में देखा जाता है, लेकिन भागवत ने इसे जीवन जीने की पद्धति के रूप में परिभाषित किया है। उनके अनुसार, स्वदेशी केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं, बल्कि अपनी भाषा, वेशभूषा और जीवनशैली पर गर्व करना है।
जब तक स्वबोध हमारे आचरण में नहीं उतरेगा, तब तक राष्ट्र का पुनरुत्थान अधूरा है।

सांस्कृतिक चेतना की शुरुआत ‘घर’ से
लेख के मुख्य बिंदुओं में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ‘पारिवारिक वातावरण’ है। भागवत ने कुछ व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समाज को आईना दिखाया है:

  • भाषा का महत्व: घर में ‘मम्मी-पापा’ के स्थान पर ‘माता-पिता’ और हस्ताक्षर के लिए अपनी मातृभाषा का प्रयोग करना केवल शब्दों का चयन नहीं, बल्कि संस्कारों का सिंचन है।
  • अतिथि सत्कार: तकिए पर ‘Welcome’ के स्थान पर ‘सुस्वागतम्’ जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े हैं।
  • पंच-तत्व: भोजन, भजन (प्रार्थना), भाषा, भूषा (पहनावा) और भवन (रहन-सहन) — यदि ये पांचों स्वदेशी होंगे, तो घर का वातावरण स्वयं ही भारतीयता से ओत-प्रोत हो जाएगा

अगली पीढ़ी और आत्ममंथन
आजकल माता-पिता अक्सर शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे अपनी संस्कृति से दूर जा रहे हैं। इस पर भागवत का सुझाव सीधा है: आत्ममंथन। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। यदि घर के भीतर भारतीयता जीवित है, तो अगली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़ेंगे। सांस्कृतिक चेतना की पहली पाठशाला स्कूल नहीं, बल्कि हमारा अपना घर है।

‘इंडिया’ से ‘भारत’ की ओर लौटने की यह यात्रा केवल नाम की नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की यात्रा है। विदेशी भाषा और संस्कृति का दबाव झेलने के बजाय अपनी विरासत को सहजता से स्वीकार करना ही वास्तविक स्वतंत्रता है। यदि हम अपनी भाषा, पहनावे और संस्कारों पर गर्व करना शुरू कर दें, तो भारत को पुनः विश्व गुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।

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