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शिंदे-बीजेपी गठबंधन की अग्निपरीक्षा: 14 शहरों में आमने-सामने आए सहयोगी

शिंदे
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महाराष्ट्र में प्रस्तावित नगर निगम चुनावों ने राज्य की राजनीति को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। नामांकन के अंतिम दिन जो दृश्य सामने आए, उन्होंने साफ कर दिया कि ये चुनाव केवल स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय की राज्य राजनीति की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।

गठबंधन के भीतर ही सबसे बड़ा संघर्ष

सत्ता में साथ होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी और  मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के बीच तालमेल जमीन पर कमजोर नजर आया। लगभग 14 नगर निगमों में दोनों दलों के स्थानीय नेताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए। इससे ये संकेत मिला कि शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बावजूद जमीनी स्तर पर असंतोष गहराई तक फैला हुआ है।

सीट बंटवारे ने खोले मतभेदों के दरवाजे

गठबंधन के भीतर असहमति की सबसे बड़ी वजह सीटों का बंटवारा रहा। कई नगर निगमों में दोनों दल खुद को ज्यादा मजबूत मान रहे थे, लेकिन सीमित सीटों के कारण अनेक नेताओं को टिकट नहीं मिल पाया। नतीजतन, नाराज़ नेताओं ने या तो बगावत का रास्ता चुना या निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया।

बगावत: गठबंधन के लिए अंदरूनी खतरा

इस चुनाव में विरोध विपक्ष से कम और अपने ही सहयोगियों से ज्यादा देखने को मिल रहा है। पार्टी अनुशासन तोड़कर चुनाव लड़ रहे बागी उम्मीदवार न केवल सीटें छीन सकते हैं, बल्कि गठबंधन के पारंपरिक वोट बैंक में भी सेंध लगा सकते हैं। यही कारण है कि बगावत को सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है।

इस्तीफों से बढ़ा राजनीतिक संदेश

कुछ स्थानों पर नेताओं ने टिकट न मिलने पर पार्टी पदों से इस्तीफा देकर विरोध जताया। ये सिर्फ असंतोष नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है कि स्थानीय नेतृत्व खुद को दरकिनार किए जाने से नाराज़ है। इससे ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या गठबंधन की निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय नेताओं की भूमिका कमजोर हो गई है।

नामांकन केंद्रों पर शक्ति प्रदर्शन

नामांकन के आखिरी दिन कई शहरों में समर्थकों की भारी भीड़ देखने को मिली। नारेबाजी, शक्ति प्रदर्शन और आपसी टकराव के चलते कई जगहों पर तनाव की स्थिति बनी। पुलिस और प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी। ये दृश्य बताता है कि नगर निगम चुनाव अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुके हैं।

विपक्ष के लिए अवसर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्तारूढ़ गठबंधन की ये अंदरूनी खींचतान विपक्षी दलों के लिए बड़ा अवसर बन सकती है। यदि बागी उम्मीदवार मैदान में टिके रहते हैं, तो वोटों का विभाजन तय है। इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है, खासकर उन शहरों में जहां मुकाबला पहले से ही करीबी माना जा रहा है।

शिंदे गुट और बीजेपी की रणनीतिक चुनौती

एकनाथ शिंदे गुट के लिए ये चुनाव अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने का अवसर है, जबकि बीजेपी इसे संगठनात्मक ताकत दिखाने का मंच मान रही है। लेकिन दोनों की रणनीतियां कई जगह एक-दूसरे से टकराती दिखीं। यही कारण है कि गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी उजागर हो गई।

नामांकन वापसी पर टिकी निगाहें

अब सबकी नजर नामांकन वापसी की अंतिम तारीख पर है। यदि नेतृत्व बागी नेताओं को मनाने में सफल रहता है, तो नुकसान सीमित हो सकता है। लेकिन यदि बगावत कायम रहती है, तो ये गठबंधन के लिए गंभीर चेतावनी साबित हो सकती है।

आने वाले चुनावों का संकेत

माना जा रहा है कि नगर निगम चुनावों के नतीजे केवल शहरी सरकारें तय नहीं करेंगे, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए भी राजनीतिक माहौल तैयार करेंगे। ऐसे में ये सियासी संग्राम भविष्य की राजनीति का ट्रेलर बन चुका है।

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