Three-Language Formula: महाराष्ट्र, जहां मराठी भाषा और संस्कृति की गहरी जड़ें हैं, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां शिक्षा नीति में बदलाव की बातें जोर पकड़ रही हैं। हाल ही में, तीन भाषा नीति (three-language formula) को लेकर चर्चा गरम है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि इस नीति पर अंतिम फैसला तब तक नहीं लिया जाएगा, जब तक लेखकों, भाषा विशेषज्ञों, और राजनीतिक नेताओं सहित सभी पक्षकारों से व्यापक विचार-विमर्श (consultations with stakeholders) न हो जाए। यह बयान उस समय आया, जब मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव विवाद का केंद्र बना हुआ है।
23 जून 2025 की देर रात, मुख्यमंत्री के आधिकारिक निवास ‘वर्षा’ में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई। इस बैठक में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, स्कूल शिक्षा मंत्री दादा भुसे, शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. पंकज भोईर, और राज्य शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। बैठक का मकसद तीन भाषा नीति (three-language formula) के विभिन्न पहलुओं पर विचार करना था। इसमें फैसला लिया गया कि पहले देश के अन्य राज्यों में इस नीति की स्थिति का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद एक विस्तृत प्रस्तुति तैयार की जाएगी, जिसमें सभी संभावित विकल्पों को शामिल किया जाएगा। खास तौर पर यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया कि मराठी भाषी छात्रों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत अकादमिक क्रेडिट बैंक प्रणाली में किसी तरह का नुकसान न हो।
महाराष्ट्र में शिक्षा का इतिहास हमेशा से भाषा और संस्कृति से जुड़ा रहा है। मराठी भाषा न केवल राज्य की पहचान है, बल्कि यह लाखों लोगों के दिलों में बस्ती है। लेकिन नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने तीन भाषा नीति को अनिवार्य कर दिया है, जिसमें मातृभाषा के साथ दो अन्य भाषाओं को पढ़ना जरूरी है। इस नीति के तहत मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने का प्रस्ताव था। 16 अप्रैल 2025 को जारी सरकारी आदेश में हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा बताया गया, लेकिन भारी विरोध के बाद 17 जून को संशोधित आदेश में कहा गया कि हिंदी ‘आम तौर पर’ तीसरी भाषा होगी। साथ ही, अगर 20 या अधिक छात्र किसी अन्य भारतीय भाषा को चुनना चाहें, तो उसका विकल्प भी उपलब्ध होगा।
इस नीति ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं जन्म दीं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के प्रमुख राज ठाकरे ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि हिंदी को थोपने की जरूरत नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बीजेपी शासित गुजरात जैसे राज्य ने हिंदी को अनिवार्य नहीं किया, तो महाराष्ट्र में यह क्यों लागू हो? शिवसेना (UBT) के नेता उद्धव ठाकरे ने भी कहा कि उनकी पार्टी हिंदी के खिलाफ नहीं है, लेकिन इसे जबरदस्ती लागू करना गलत है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इसे मराठी भाषा और पहचान पर हमला बताया। एक सामाजिक कार्यकर्ता, मधुकर पाटिल, ने बताया कि मराठी भाषा को लेकर लोगों की भावनाएं गहरी हैं। उनके मुताबिक, युवा पीढ़ी मराठी के साथ अंग्रेजी और अन्य भाषाएं सीखने को तैयार है, लेकिन किसी भाषा को थोपना स्वीकार्य नहीं है।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने इस विवाद को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मराठी सभी स्कूलों में अनिवार्य रहेगी, और हिंदी को अनिवार्य करने का कोई इरादा नहीं है। देहू में संत तुकाराम वारी के दौरान उन्होंने कहा कि NEP के तहत तीन भाषा नीति पूरे देश में लागू है। अगर तमिलनाडु जैसे राज्य ने इसे चुनौती दी, तो भी कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। फडणवीस ने यह भी कहा कि भारतीय भाषा सीखने में कोई बुराई नहीं है। एक शिक्षक, अनिता जोशी, ने बताया कि हिंदी शिक्षकों की उपलब्धता के कारण इसे तीसरी भाषा के रूप में प्रस्तावित किया गया था। लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, तेलुगु, या कन्नड़ के लिए शिक्षक ढूंढना मुश्किल है।
बैठक में यह भी तय हुआ कि मराठी साहित्यकारों और भाषा विद्वानों से परामर्श किया जाएगा। अखिल भारतीय मराठी साहित्य महामंडल ने इस नीति का विरोध किया था, उनका कहना था कि यह नीति मराठी संस्कृति पर हिंदी के ‘सांस्कृतिक आक्रमण’ को बढ़ावा देती है। मराठी लेखक हेमंत दिवटे ने विरोध में अपना ‘कवि केशवसुत पुरस्कार’ लौटा दिया। उन्होंने कहा कि जब तक सरकार इस फैसले को वापस नहीं लेती, वे अपना विरोध जारी रखेंगे। मराठी अध्यास केंद्र सहित 18 संगठनों ने भी दो भाषा नीति को बनाए रखने की मांग की। इन संगठनों का कहना है कि छोटी उम्र में तीन भाषाएं सीखना बच्चों पर बोझ हो सकता है।
महाराष्ट्र में भाषा का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, मुंबई में हिंदी को मातृभाषा मानने वालों की संख्या 2001 के 26 लाख से बढ़कर 36 लाख हो गई, जबकि मराठी बोलने वालों की संख्या 45 लाख से घटकर 44 लाख रह गई। यह बदलाव मराठी पहचान को लेकर चिंता का कारण बना है। एक युवा छात्र, प्रणव कुलकर्णी, ने बताया कि वह मराठी और अंग्रेजी के साथ हिंदी सीखने को तैयार है, लेकिन उसे लगता है कि स्कूलों को अन्य भारतीय भाषाओं का विकल्प भी देना चाहिए।
शिक्षा मंत्री दादा भुसे को अब सभी पक्षकारों के साथ परामर्श की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार ने यह भी तय किया कि मराठी छात्रों को अकादमिक नुकसान न हो, इसके लिए विशेष ध्यान दिया जाएगा। NEP के तहत अकादमिक क्रेडिट बैंक प्रणाली में छात्रों को अपनी पढ़ाई के क्रेडिट्स को जोड़ने की सुविधा मिलती है। अगर मराठी छात्रों को तीसरी भाषा के कारण नुकसान होता है, तो यह उनके भविष्य को प्रभावित कर सकता है। एक शिक्षा विशेषज्ञ, डॉ. रमेश पाटिल, ने बताया कि अन्य राज्यों में तीन भाषा नीति को लागू करने के तरीके अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक में कन्नड़, अंग्रेजी, और हिंदी या संस्कृत पढ़ाई जाती है, जबकि तमिलनाडु ने दो भाषा नीति को बनाए रखा है।
महाराष्ट्र की यह कहानी उन लाखों लोगों की भावनाओं को दर्शाती है, जो अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के अवसर चाहते हैं। सरकार के सामने चुनौती है कि वह ऐसी नीति बनाए, जो मराठी की गरिमा को बनाए रखे और साथ ही छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए।
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