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उत्तर प्रदेश: मां का पोस्टमार्टम कराने अकेला पहुंचा 8 साल का मासूम, समाज ने मोड़ लिया मुंह

उत्तर प्रदेश
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उत्तर प्रदेश के एटा जिले से सामने आई ये घटना इंसानियत को झकझोर देने वाली है। यहां एक 8 साल का मासूम बच्चा अपनी मां के शव को लेकर अकेले पोस्टमार्टम हाउस पहुंचा। न कोई रिश्तेदार साथ था, न कोई पड़ोसी और न ही समाज का कोई सहारा। इस दृश्य ने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं।

एड्स से हुई थी पिता की मौत
मृतक महिला की पहचान नीलम के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि कुछ साल पहले नीलम के पति की मौत एड्स जैसी गंभीर बीमारी के कारण हो गई थी। पति की मौत के बाद से ही नीलम और उसका बेटा सामाजिक उपेक्षा का शिकार हो गए थे। बीमारी के डर और अज्ञानता के चलते लोगों ने परिवार से दूरी बना ली थी। धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि मां और बेटा समाज से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए।

रिश्तेदारों ने फेरा मुंह
हाल ही में नीलम की तबीयत अचानक बिगड़ गई और इलाज के अभाव में उनकी मौत हो गई। मां की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल ये था कि अंतिम प्रक्रिया कौन करेगा। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने आगे आने से इनकार कर दिया। ऐसे हालात में आठ साल का मासूम खुद अपनी मां के शव को लेकर पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गया।

बच्चे को देश इमोशनल हुए कर्मचारी
पोस्टमार्टम हाउस में जब अधिकारियों और कर्मचारियों ने ये दृश्य देखा तो हर कोई स्तब्ध रह गया। एक बच्चा, जो खुद इस उम्र में मां की गोद का हकदार होता है, वो अपनी मां की मौत के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी कराने के लिए अकेला खड़ा था। बच्चे को ये तक ठीक से नहीं पता था कि पोस्टमार्टम क्या होता है, लेकिन उसे बस इतना मालूम था कि मां को “अस्पताल ले जाना है”।

कब जागरुक होगा समाज?
ये घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज की उस मानसिकता को भी उजागर करती है, जहां बीमारी के नाम पर इंसानों से रिश्ता तोड़ लिया जाता है। एड्स जैसी बीमारियों को लेकर आज भी समाज में जागरूकता की भारी कमी है। डर और भ्रांतियों के कारण लोग पीड़ित परिवारों से दूरी बना लेते हैं, जिसका खामियाजा अक्सर मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है।

प्रशासन की ओर से बाद में बच्चे की मदद की गई और आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कराई गईं। लेकिन ये सवाल अब भी बना हुआ है कि अगर समाज और सिस्टम समय पर साथ देते, तो शायद एक बच्चे को इतनी बड़ी जिम्मेदारी अकेले नहीं उठानी पड़ती।

एटा की ये घटना हमें ये सोचने पर मजबूर करती है कि विकास और आधुनिकता के दौर में भी इंसानियत कितनी कमजोर पड़ गई है। एक 8 साल का बच्चा मां का पोस्टमार्टम कराने अकेले पहुंच जाए और समाज चुपचाप देखता रहे, तो ये केवल एक खबर नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक संवेदनाओं पर सवाल है।

ये कहानी हमें याद दिलाती है कि बीमारी से नहीं, बल्कि संवेदना की कमी से समाज सबसे ज्यादा बीमार होता है।

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