गिद्ध हमारे आसपास के माहौल को साफ रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। ये पक्षी मरे हुए जानवरों को खाकर कुदरत के सफाईकर्मी का काम करते हैं। इससे बीमारियां नहीं फैलतीं और हमारा पर्यावरण स्वच्छ रहता है। लेकिन एक बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत में गिद्धों की तादाद तेजी से कम हो रही है। इसका नतीजा यह हो सकता है कि हर साल हजारों लोगों की जान चली जाए।
1990 के बीच में, गिद्धों की संख्या में अचानक बहुत ज्यादा गिरावट आई। कुछ तरह के गिद्धों की संख्या तो 99.9% तक घट गई। इसकी सबसे बड़ी वजह थी दर्द कम करने वाली एक दवा – डाइक्लोफेनाक। जानवरों को दी गई यह दवा गिद्धों के लिए जहर बन गई। जब गिद्ध इस दवा वाले मरे जानवरों को खाते थे, तो वे खुद भी मर जाते थे।
गिद्धों की कमी से कई तरह की मुसीबतें खड़ी हो रही हैं:
- मरे हुए जानवरों को अब गिद्ध नहीं खा पाते, जिससे ये लाशें सड़ने लगती हैं और बीमारियां फैलती हैं।
- आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ गई है, जो इन मरे जानवरों को खाते हैं।
- इससे रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी फैलने का डर बढ़ गया है।
भारतीय गिद्ध एक बहुत बड़ा शिकारी पक्षी है। इसके पंखों का फैलाव करीब 2 से ढाई मीटर तक होता है। ये मरे हुए जानवरों को खाकर हमारे आसपास को साफ रखते हैं। ये ज्यादातर दक्षिण एशिया में पाए जाते हैं, खासकर भारत, पाकिस्तान और नेपाल में।
पहले भारत में गिद्धों की संख्या करोड़ों में थी। वे खुले मैदानों, घास के मैदानों और सूखे इलाकों में रहते थे। ये पक्षी ऊंची चट्टानों या पुराने खंडहरों पर अपना घर बनाते थे। लेकिन अब इनकी गिनती बहुत कम हो गई है।
इस जांच से साफ हो गया है कि गिद्धों की कमी से न सिर्फ हमारे आसपास के माहौल को नुकसान हो रहा है, बल्कि लोगों की जान भी खतरे में पड़ रही है। अगर गिद्धों की संख्या बढ़ाने के लिए जल्द कुछ नहीं किया गया, तो आने वाले वक्त में इसके बहुत बुरे नतीजे देखने को मिल सकते हैं। हमें गिद्धों को बचाने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए, ताकि हम अपने पर्यावरण और अपनी सेहत की रक्षा कर सकें।
ये भी पढ़ें: मोदी सरकार का नया दांव: नीति आयोग में अपनों को किया बाय-बाय, सहयोगियों को दी एंट्री! क्या है इस चाल का राज?




























