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ट्रम्प के ‘मीडिएटर’ बने जनरल आसिम मुनीर: ईरान-सऊदी जंग की आहट से कांपा पाकिस्तान, दांव पर लगा IMF फंड और आंतरिक सुरक्षा!

पाकिस्तान
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इस्लामाबाद: पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में गहराते युद्ध के बादलों ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। इस्लामाबाद के गलियारों में इस बात की गंभीर चिंता है कि यदि ईरान और उसके विरोधियों के बीच जंग लंबी खिंचती है, तो पाकिस्तान चाहकर भी इससे अछूता नहीं रह पाएगा। पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर के लिए यह उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है, जहाँ उन्हें न केवल अपनी अर्थव्यवस्था बल्कि अपनी सीमाओं को भी बचाना है।

मुनीर का ‘बैलेंसिंग एक्ट’: मजबूरी या कूटनीति?
डॉनल्ड ट्रम्प के अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रभाव और ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच, जनरल मुनीर को एक ‘मध्यस्थ’ (Mediator) की भूमिका निभाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्हें सऊदी अरब और ईरान के बीच एक बेहद बारीक संतुलन बनाना है, जो फिलहाल नामुमकिन सा नजर आ रहा है।

* सऊदी अरब का सैन्य दबाव: पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक पुराना सैन्य समझौता है। यदि सऊदी अरब इस करार का हवाला देता है, तो पाकिस्तान को कानूनी और नैतिक रूप से ईरान के खिलाफ युद्ध में सऊदी की मदद के लिए सेना उतारनी पड़ सकती है।
* अमेरिका और IMF का खौफ: सऊदी अरब स्पष्ट रूप से अमेरिकी खेमे का हिस्सा है। यदि पाकिस्तान सऊदी (और अमेरिका) का साथ देने से कतराता है, तो वाशिंगटन की नाराजगी उसे भारी पड़ेगी। अमेरिका से बिगड़े रिश्तों का सीधा मतलब है IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) से मिलने वाली वित्तीय मदद पर ब्रेक लग जाना, जो पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसा होगा।

ईरान का मोर्चा: शरणार्थी संकट और आंतरिक विद्रोह
दूसरी ओर, ईरान के साथ पाकिस्तान की लंबी सीमा और धार्मिक समीकरण जनरल मुनीर के लिए दूसरा बड़ा सिरदर्द हैं।

* शरणार्थियों का सैलाब: यदि ईरान पर अमेरिकी या सहयोगी देशों का हमला होता है, तो लाखों की संख्या में ईरानी शरणार्थी पाकिस्तानी सीमा (बलूचिस्तान) में दाखिल हो सकते हैं। पहले से ही अफगान शरणार्थियों के बोझ से दबे पाकिस्तान के लिए यह एक नया मानवीय और सुरक्षा संकट खड़ा कर देगा।

* शिया आबादी का दबाव: ईरान के बाद दुनिया की सबसे बड़ी शिया आबादी पाकिस्तान में रहती है। ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ और धार्मिक संवेदनाओं के चलते पाकिस्तान के भीतर व्यापक विरोध प्रदर्शन और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। पाकिस्तान के लिए अपने ही नागरिकों के बीच ईरान के खिलाफ जाना आत्मघाती साबित हो सकता है।

पाकिस्तान के पास विकल्प क्या हैं?
फिलहाल पाकिस्तान की रणनीति ‘इंतजार करो और देखो’ की है। जनरल मुनीर कोशिश कर रहे हैं कि पर्दे के पीछे से ट्रम्प प्रशासन और तेहरान के बीच संवाद का कोई जरिया बने ताकि युद्ध को टाला जा सके।

विशेषज्ञों की राय: “पाकिस्तान इस समय ‘आग के दरिया’ के बीच में खड़ा है। एक तरफ कुआं है (अर्थव्यवस्था की तबाही) और दूसरी तरफ खाई (आंतरिक दंगे और युद्ध)। मुनीर का हर कदम पाकिस्तान का भविष्य तय करेगा।”

पाकिस्तान के लिए यह जंग केवल दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि उसके अपने अस्तित्व की लड़ाई बनती जा रही है। क्या जनरल मुनीर अमेरिका को खुश रख पाएंगे या ईरान के साथ अपने धार्मिक और सीमाई रिश्तों को बचा पाएंगे? यह आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे।

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