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लैंडिंग और टेकऑफ के समय क्यों बढ़ जाता है विमान हादसों का खतरा? जानें क्या कहते हैं विशेषज्ञ

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हवाई यात्रा को दुनिया के सबसे सुरक्षित परिवहन माध्यमों में गिना जाता है, इसके बावजूद जब भी कोई विमान हादसा होता है, तो अक्सर ये सवाल उठता है कि दुर्घटनाएं ज़्यादातर टेकऑफ या लैंडिंग के समय ही क्यों होती हैं। विमानन विशेषज्ञों के अनुसार, उड़ान के ये दोनों चरण सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं और इन्हीं क्षणों में छोटी सी चूक भी बड़े हादसे में बदल सकती है।

उड़ान के सबसे नाज़ुक पल होते हैं टेकऑफ और लैंडिंग

विमान के टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान पायलट को बहुत कम ऊंचाई पर अत्यधिक सटीकता के साथ विमान को नियंत्रित करना होता है। इस दौरान विमान की गति, हवा का दबाव, रनवे की लंबाई और तकनीकी सिस्टम – सब कुछ एक साथ काम करता है। किसी एक भी सिस्टम में खराबी आने पर स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। यही वजह है कि आंकड़ों के अनुसार, अधिकतर विमान दुर्घटनाएं इन्हीं दो चरणों में दर्ज की जाती हैं।

तकनीकी खराबी बन सकती है बड़ी वजह

लैंडिंग या टेकऑफ के समय विमान का इंजन, फ्लैप्स, लैंडिंग गियर और ब्रेकिंग सिस्टम अत्यधिक दबाव में होते हैं। यदि किसी कारण से तकनीकी खराबी आ जाए, तो पायलट के पास प्रतिक्रिया देने का समय बेहद कम होता है। छोटे या संकरे एयरस्ट्रिप्स पर ये जोखिम और बढ़ जाता है, क्योंकि वहां आपात स्थिति में सुधार की गुंजाइश सीमित होती है।

मौसम की भूमिका भी अहम

खराब मौसम, तेज़ हवाएं, कम दृश्यता, बारिश या धुंध भी विमान हादसों का बड़ा कारण बन सकती हैं। लैंडिंग के समय क्रॉसविंड यानी तिरछी हवा विमान का संतुलन बिगाड़ सकती है। इसी तरह टेकऑफ के समय हवा की दिशा और गति में अचानक बदलाव विमान को अस्थिर कर सकता है।

मानवीय कारक और समय का दबाव

हालांकि पायलट उच्च स्तर की ट्रेनिंग से गुजरते हैं, लेकिन टेकऑफ और लैंडिंग के दौरान निर्णय लेने के लिए समय बहुत सीमित होता है। किसी आपात स्थिति में कुछ सेकंड की देरी या गलत आकलन गंभीर परिणाम ला सकता है। विशेषज्ञ इसे “क्रिटिकल फेज ऑफ फ्लाइट” कहते हैं, जहां मानवीय गलती की गुंजाइश सबसे कम होती है।

काल्पनिक संदर्भ से समझें स्थिति

यदि किसी राजनीतिक या वीआईपी यात्रा के दौरान विमान को छोटे एयरपोर्ट पर उतरना हो और वहां तकनीकी समस्या सामने आ जाए, तो जोखिम स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में पायलट को बहुत कम समय में यह तय करना पड़ता है कि लैंडिंग जारी रखनी है या विमान को दोबारा ऊपर उठाना है। इसी निर्णय की जटिलता कई बार हादसे की वजह बन जाती है।

सुरक्षा मानकों के बावजूद जोखिम क्यों रहता है

विमानन क्षेत्र में सुरक्षा के कड़े मानक लागू होते हैं और हर उड़ान से पहले तकनीकी जांच की जाती है। इसके बावजूद शून्य जोखिम संभव नहीं है। टेकऑफ और लैंडिंग ऐसे चरण हैं, जहां भौतिक नियम, मशीनरी और मानवीय कौशल एक साथ परीक्षा में होते हैं।

विमान हादसों का टेकऑफ और लैंडिंग से जुड़ा होना महज संयोग नहीं, बल्कि तकनीकी और वैज्ञानिक कारणों का नतीजा है। यही वजह है कि इन दोनों चरणों पर सबसे अधिक सतर्कता बरती जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उन्नत तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार से इन जोखिमों को और कम किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह खत्म करना फिलहाल संभव नहीं है।

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