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समंदर में ‘सन्नाटा’: ₹115 पहुंचा डीजल, किनारों पर खड़ी हुईं नावें; दांव पर लगा लाखों मछुआरों का निवाला

डीजल
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महाराष्ट्र के गौरवशाली समुद्र तटों पर इन दिनों लहरों के शोर से ज्यादा मछुआरों की चिंताएं सुनाई दे रही हैं। आसमान छूती डीजल की कीमतों ने मछली पकड़ने वाली नावों के इंजन शांत कर दिए हैं। ससून डॉक से लेकर कोंकण के तटों तक, दर्जनों नावें समुद्र में उतरने के बजाय किनारों पर जंग खाने को मजबूर हैं। यह केवल ईंधन का संकट नहीं है, बल्कि उन लाखों परिवारों के अस्तित्व की लड़ाई है जिनका चूल्हा समंदर की लहरों से जलता है।

1. गणित जो बिगड़ गया: ₹35,000 का अतिरिक्त बोझ
मछली पकड़ने का व्यवसाय पूरी तरह से डीजल की खपत पर टिका है। ‘ससून डॉक मासेमारी बंदर बचाओ’ कृति समिति के अध्यक्ष कृष्णा पावले ने इस संकट का भयावह गणित साझा किया है:

* खपत का पैमाना: एक साधारण यांत्रिक नाव जब एक सप्ताह के लिए गहरे समुद्र में जाती है, तो उसे लगभग 1500 लीटर डीजल की आवश्यकता होती है।
* कीमतों में उछाल: पहले मछुआरों को कोटे के तहत करीब ₹91.44 प्रति लीटर डीजल मिलता था, लेकिन अब यह भाव ₹115 प्रति लीटर तक जा पहुंचा है।
* प्रति चक्कर घाटा: डीजल में प्रति लीटर लगभग ₹23 की बढ़ोतरी का सीधा अर्थ है कि हर एक ट्रिप पर मछुआरे को ₹34,500 से ₹35,000 का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है।
इतना भारी खर्च उठाकर समंदर में जाना अब हमारे लिए मुनाफे का सौदा नहीं, बल्कि कर्ज के जाल में फंसने जैसा है।” — कृष्णा पावले

सब्सिडी का ‘भ्रम’ और सहकारी समितियों का संकट
महाराष्ट्र में मछली पकड़ने का ढांचा सहकारी समितियों के इर्द-गिर्द बुना गया है।

* नेटवर्क: राज्य में 136 सहकारी समितियों के माध्यम से करीब 7,550 यांत्रिक नौकाएं संचालित होती हैं।
* सब्सिडी की अनिश्चितता: पहले मछुआरों को ₹15 प्रति लीटर की सब्सिडी मिलती थी, जिससे डीजल की लागत वहनीय रहती थी। वर्तमान में डीजल ₹115 पार कर गया है, लेकिन सब्सिडी की स्थिति स्पष्ट न होने से मछुआरों में भारी आक्रोश और भ्रम है।

राजनीतिक हस्तक्षेप: केंद्र के पाले में गेंद
संकट की गंभीरता को देखते हुए राज्य के मत्स्य एवं बंदरगाह मंत्री नितेश नारायण राणे ने मोर्चा संभाला है। उन्होंने केंद्र सरकार को औपचारिक पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

* मांग: मछुआरों के लिए विशेष ‘फ्यूल रिलीफ पैकेज’ या सब्सिडी को सीधे बैंक खातों (DBT) के जरिए पारदर्शी बनाने की अपील की गई है।
* चिंता: यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो राज्य में मछली की आपूर्ति प्रभावित होगी, जिससे आम जनता के लिए ‘सीफूड’ की कीमतें भी आसमान छू सकती हैं।

ठिठका हुआ रोजगार
मछली पकड़ने का सीजन अपने चरम पर है, लेकिन डीजल की आग ने समंदर की ठंडक को सोख लिया है। मछुआरों का कहना है कि यदि सरकार ने तत्काल सब्सिडी बहाल नहीं की या डीजल की दरों में कटौती नहीं की, तो यह पारंपरिक व्यवसाय पूरी तरह ठप हो जाएगा। हजारों नावें खड़ी होने का मतलब केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और हजारों परिवारों के रोजगार पर सीधा प्रहार है।

अब नजरें केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं—क्या समंदर के इन बेटों को राहत मिलेगी या इस साल का सीजन भी ‘महंगाई’ की लहरों में बह जाएगा?

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