देश में महंगाई लगातार आम लोगों की जेब पर भारी पड़ती जा रही है। पेट्रोल-डीजल और CNG की बढ़ती कीमतों से लेकर खाद्य पदार्थों की महंगाई और बढ़ती EMI तक, हर तरफ आर्थिक दबाव महसूस किया जा रहा है। अर्थशास्त्री इस स्थिति को ‘महंगाई का दुष्चक्र’ कह रहे हैं, जहां एक समस्या दूसरी समस्या को जन्म देती है और आखिरकार इसका सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ता है।
हाल के दिनों में थोक महंगाई दर (WPI) में तेज उछाल, कच्चे तेल की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी और अल नीनो के खतरे ने देश की आर्थिक चिंता को और गहरा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई का असर और व्यापक हो सकता है।
कैसे शुरू होता है महंगाई का दुष्चक्र?
महंगाई का ये चक्र आमतौर पर दो बड़े कारणों से शुरू होता है – ईंधन की कीमतों में उछाल और मौसम संबंधी संकट।
पेट्रोल-डीजल और CNG की बढ़ती कीमतें
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ा है।
जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल, डीजल और CNG की लागत भी बढ़ जाती है। इससे परिवहन खर्च बढ़ता है और फिर रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी ऊपर जाने लगती हैं। सब्जियों, दूध, राशन और अन्य जरूरी सामान की ढुलाई महंगी होने से बाजार में हर चीज का दाम बढ़ने लगता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, डीजल की कीमत में थोड़ी सी बढ़ोतरी भी माल ढुलाई की लागत को कई प्रतिशत तक बढ़ा सकती है।
अल नीनो और कमजोर मानसून का खतरा
महंगाई बढ़ाने वाला दूसरा बड़ा कारण अल नीनो को माना जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अल नीनो के कारण बारिश कम होने की आशंका है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
धान, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलों पर इसका असर पड़ सकता है। अगर फसल उत्पादन कम हुआ तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में और तेजी आ सकती है। यही वजह है कि खाद्य महंगाई को लेकर भी चिंता बढ़ रही है।
कंपनियों की बढ़ती लागत का असर
जब ईंधन और कच्चा माल महंगा होता है, तो कंपनियों की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। फैक्ट्रियों, परिवहन और बिजली खर्च में वृद्धि होने से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ता है।
कंपनियां इस अतिरिक्त लागत को अंततः ग्राहकों पर डालती हैं। यही कारण है कि बाजार में रोजमर्रा के सामान से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्माण सामग्री तक की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
थोक महंगाई दर में तेज बढ़ोतरी इस बात का संकेत मानी जा रही है कि आने वाले समय में खुदरा महंगाई भी बढ़ सकती है।
RBI की चिंता और EMI पर असर
महंगाई बढ़ने पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने सबसे बड़ी चुनौती कीमतों को नियंत्रित करने की होती है। इसके लिए RBI अक्सर रेपो रेट बढ़ाने का विकल्प अपनाता है।
रेपो रेट वो ब्याज दर होती है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है। जब ये दर बढ़ती है तो बैंक भी होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन पर ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। इसका सीधा असर आम लोगों की EMI पर पड़ता है।
अगर आने वाले महीनों में महंगाई नियंत्रण में नहीं आई, तो लोगों की मासिक EMI और बढ़ सकती है। इससे मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों का घरेलू बजट और प्रभावित हो सकता है।
आम आदमी पर दोहरी मार
महंगाई के इस दुष्चक्र में आम नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। एक तरफ रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च बढ़ता है, वहीं दूसरी तरफ बैंक लोन और EMI का बोझ भी बढ़ने लगता है।
ईंधन महंगा होने से यात्रा और ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है। कमजोर मानसून से खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं। कंपनियों की लागत बढ़ने से बाजार में वस्तुओं के दाम ऊपर जाते हैं और अंत में ब्याज दरें बढ़ने से लोन महंगे हो जाते हैं।
आगे क्या हो सकता है?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक तेल बाजार में तनाव कम नहीं हुआ और मानसून कमजोर रहा, तो महंगाई आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है। सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात और मौसम की अनिश्चितता चुनौती बनी हुई है।
ऐसे में आने वाला समय आम लोगों के लिए आर्थिक रूप से और कठिन हो सकता है। महंगाई का ये दुष्चक्र केवल बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर हर परिवार के मासिक बजट और जीवनशैली पर साफ दिखाई देने लगा है।
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