दुनिया के एक हिस्से में छिड़ी जंग की आग अब भारतीय आसमान की सुरक्षा तैयारियों तक पहुँच गई है। मध्य-पूर्व (Middle East) में जारी भीषण संघर्ष और इसके कारण चरमराई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) ने भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस’ (LCA Tejas) के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं। तेजस के इंजनों की मुख्य आपूर्तिकर्ता अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) ने हाथ खड़े करते हुए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को सूचित किया है कि वे फिलहाल इंजनों की डिलीवरी देने में असमर्थ हैं।
करार और डिलीवरी का गणित: कहाँ अटकी खेप?
भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ाने के लिए HAL और अमेरिका की GE के बीच कुल 113 इंजनों की आपूर्ति का बड़ा करार हुआ था। योजना के मुताबिक, इस साल मार्च 2026 तक भारत को कम से कम 10 नए इंजन मिल जाने चाहिए थे, ताकि तेजस मार्क-1A का उत्पादन समय पर पूरा हो सके।
* अधूरी रह गई उम्मीद: भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार, आखिरी बार दिसंबर 2025 में भारत को केवल पांचवां इंजन प्राप्त हुआ था। इसके बाद से सप्लाई पूरी तरह ठप है।
* साल के अंत तक इंतज़ार: GE ने साफ कर दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में सप्लाई बहाल करना संभव नहीं है। अब अगली खेप मिलने की उम्मीद इस साल के अंत (दिसंबर 2026) तक ही जताई जा रही है।
मध्य-पूर्व युद्ध का सीधा असर
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध के कारण कच्चे माल की कमी, लॉजिस्टिक्स की समस्या और शिपिंग रूट्स में आए बदलाव ने अमेरिकी रक्षा उद्योग की उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है। विमान इंजनों के लिए ज़रूरी जटिल पुर्जों की सप्लाई लाइन बाधित होने से GE अपने अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स पूरे नहीं कर पा रही है।
भारतीय वायुसेना के लिए चिंता का विषय
भारतीय वायुसेना अपने पुराने होते मिग-21 विमानों को हटाकर उनकी जगह ‘तेजस’ को तैनात करने की रणनीति पर काम कर रही है। इंजनों की सप्लाई में देरी का मतलब है कि HAL के कारखानों में तैयार खड़े विमानों के ढांचे (Airframes) को आसमान में उड़ने के लिए लंबा इंतज़ार करना होगा। इससे वायुसेना के लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन क्षमता पर सीधा असर पड़ सकता है।
यह स्थिति भारत के लिए एक बड़ा सामरिक सबक है। इंजन जैसे ‘क्रिटिकल’ कंपोनेंट्स के लिए किसी एक विदेशी वेंडर पर अत्यधिक निर्भरता, वैश्विक संकट के समय देश की सुरक्षा तैयारियों को प्रभावित कर सकती है। अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय इस देरी की भरपाई के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता निकालते हैं।
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