क्या आपने कभी सोचा है कि अगर युद्ध के बीच किसी देश का इंटरनेट बंद हो जाए, तो उसकी सेना क्या करेगी? उसके ड्रोन कैसे काम करेंगे और सैनिक एक-दूसरे से संपर्क कैसे करेंगे? रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सैटेलाइट इंटरनेट को लेकर सामने आया विवाद कुछ ऐसे ही सवाल खड़े करता है। इसका सीधा संबंध भारत की सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता, यानि Technological self-reliance से भी है।
क्या है पूरा मामला?
दुनिया के सबसे अमीर कारोबारियों में शामिल एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी SpaceX सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट सेवा देती है। इस सेवा का नाम Starlink है। इसके अलावा, कंपनी की Starshield नाम की एक प्रणाली भी है, यानि एक सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल सरकारी और सैन्य जरूरतों के लिए किया जाता है।
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में संचार के लिए इन सेवाओं की अहम भूमिका रही है। यूक्रेन की सेना सैटेलाइट तकनीक की मदद से दूर-दराज के इलाकों में भी संपर्क बनाए रख सकती है।
लेकिन अक्टूबर 2026 के मध्य में यूक्रेन में तेज गति से उड़ने वाले कुछ ड्रोन की कनेक्टिविटी प्रभावित होने की खबर सामने आई। बताया गया कि करीब 160 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति पर कनेक्शन संबंधी समस्याएं आईं। इससे ड्रोन के इस्तेमाल और दुश्मन के ड्रोन को रोकने की कुछ गतिविधियों पर असर पड़ने की बात कही गई।
हालांकि, इस परेशानी के लिए किसका फैसला जिम्मेदार था और इसके पीछे क्या कारण थे, इसे लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। इसलिए इस मामले में सामने आए दावों को अंतिम सच मानने से पहले आधिकारिक जानकारी देखना जरूरी है।
भारत के लिए यह मामला क्यों जरूरी है?
अब सवाल उठता है कि यूक्रेन में हुई इस घटना से भारत को क्या सीखना चाहिए?
मान लीजिए कि भारत की सेना या कोई जरूरी सरकारी सेवा किसी विदेशी कंपनी की तकनीक पर बहुत ज्यादा निर्भर है। अगर किसी कारण से उस कंपनी की सेवा बंद हो जाए, तकनीकी पाबंदी लग जाए या सेवा की शर्तें बदल जाएं, तो काम प्रभावित हो सकता है।
यही वजह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जरूरी तकनीक के मामले में किसी एक विदेशी कंपनी पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी तकनीक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसका मतलब है कि हमारे पास अपनी तकनीक और जरूरत पड़ने पर दूसरे विकल्प भी होने चाहिए।
भारत के पास अपनी सैटेलाइट तकनीक भी है
भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने उपग्रह तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है।
ISRO की व्यावसायिक इकाई न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड यानी NSIL उपग्रह आधारित संचार सेवाओं और अंतरिक्ष तकनीक के व्यावसायिक उपयोग में भूमिका निभाती है।
भारत के लिए जरूरी है कि वह अपनी सैटेलाइट संचार व्यवस्था को और मजबूत करे। इसके लिए भारतीय कंपनियों, वैज्ञानिकों, स्टार्टअप और सरकारी संस्थानों को मिलकर काम करना होगा।
अगर देश अपनी जरूरत के मुताबिक सुरक्षित संचार तकनीक विकसित करता है, तो विदेशी सेवाओं में किसी तरह की रुकावट आने पर भी जरूरी काम जारी रखने की क्षमता बढ़ सकती है।
सिर्फ तकनीक बनाना नहीं, उसे सुरक्षित रखना भी जरूरी
आज के समय में इंटरनेट केवल मोबाइल चलाने या वीडियो देखने का साधन नहीं है। इसका इस्तेमाल सेना, बैंकिंग, हवाई यातायात, आपदा प्रबंधन और कई जरूरी सेवाओं में भी होता है।
इसलिए भारत को तीन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पहली, देश में अपनी तकनीक विकसित की जाए। दूसरी, किसी एक कंपनी या नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखी जाए। तीसरी, इन प्रणालियों की सुरक्षा और लगातार काम करते रहने की क्षमता की नियमित जांच की जाए।
आखिर में भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा सबक?
यूक्रेन का अनुभव ये याद दिलाता है कि आज के दौर में तकनीक भी किसी देश की ताकत का अहम हिस्सा है। सैटेलाइट इंटरनेट और सुरक्षित संचार व्यवस्था युद्ध के मैदान में बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं।
भारत को दूसरे देशों के साथ तकनीकी सहयोग जारी रखते हुए अपनी क्षमताओं को भी मजबूत करना होगा, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों और सेवाओं के लिए किसी एक विदेशी कंपनी पर निर्भर न रहना पड़े।
क्योंकि असली तकनीकी आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ अपनी तकनीक बनाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसके भरोसे अपना काम जारी रख पाना भी है।
























