Crude Oil Price: अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल तेज हो गई है। दोनों देशों के बीच हालिया हमलों के बाद निवेशकों में इस बात की चिंता बढ़ी है कि कहीं तेल की आपूर्ति और समुद्री परिवहन प्रभावित न हो जाए। इसका तत्काल असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला और ब्रेंट क्रूड फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया।
होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ी चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच ताजा टकराव का केंद्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट है। ये समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है और दुनिया के तेल कारोबार का करीब पांचवां हिस्सा इस रास्ते से जुड़ा है।
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान के लारक द्वीप पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। अमेरिका का कहना है कि वहां से समुद्री मार्ग में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी की जा रही थी। इसके बाद ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई की गई।
90 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड
तनाव बढ़ने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। 31 अगस्त को ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। शुरुआती कारोबार में इसमें करीब 2-3 फीसदी तक तेजी दर्ज की गई, जबकि WTI क्रूड भी 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया।
तेल बाजार में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह आपूर्ति बाधित होने की आशंका है। अगर होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है।
पहले भी 120 डॉलर तक पहुंच चुका है तेल
अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान इससे पहले भी कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखा जा चुका है। अप्रैल में होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी चिंताओं के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। इसका असर कई देशों में ईंधन और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर देखने को मिला था।
अब दोबारा तनाव बढ़ने के बाद बाजार में ये सवाल उठ रहा है कि संघर्ष कितने समय तक जारी रहेगा और क्या इसका असर तेल की सप्लाई पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने पर देश के आयात बिल पर सीधा दबाव बढ़ सकता है।
तेल की कीमतों में लगातार तेजी का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो सकती है और इसका असर खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, महंगे कच्चे तेल से भारत का व्यापार घाटा और डॉलर की मांग भी प्रभावित हो सकती है। यानी अमेरिका-ईरान तनाव अगर लंबा खिंचता है, तो इसका असर वैश्विक बाजार के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ी निगाह होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही और अमेरिका-ईरान के बीच आगे होने वाली सैन्य कार्रवाई पर है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि संघर्ष जितना लंबा चलेगा, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम उतना ही बढ़ेगा।
हालांकि, तेल की कीमतों की अगली दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि तनाव सीमित रहता है या संघर्ष का दायरा और बढ़ता है।

























