जब भी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) किसी नए मिशन की घोषणा करता है, पीएसएलवी (PSLV) का नाम सामने आता है। पीएसएलवी का मतलब है पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (Polar Satellite Launch Vehicle) । ये भारत का तीसरी पीढ़ी का लॉन्च व्हीकल है और अंतरिक्ष में कई बड़े मिशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है।
इस लेख में हम समझेंगे कि क्या इसरो हर नए मिशन के लिए नया पीएसएलवी बनाता है और स्पेस में जाने वाला हिस्सा (Spacecraft Part) वापस कैसे आता है।
क्या है PSLV और यह कैसे काम करता है?
पीएसएलवी भारत का पहला लॉन्च व्हीकल है जिसमें लिक्विड रॉकेट इंजन का इस्तेमाल किया गया। इसमें चार स्टेज (Stages) होती हैं, जो इसे अंतरिक्ष में उपग्रहों को भेजने के लिए सक्षम बनाती हैं। हर स्टेज की अपनी खासियत होती है।
पहली स्टेज: सॉलिड रॉकेट मोटर का उपयोग किया जाता है, जो शुरुआती थ्रस्ट देता है।
दूसरी स्टेज: इसमें लिक्विड इंजन “विकास” का इस्तेमाल होता है।
तीसरी स्टेज: ये सॉलिड मोटर पर आधारित है और ऊपरी हिस्से को आगे बढ़ाती है।
चौथी स्टेज: इसमें दो लिक्विड इंजन होते हैं, जो उपग्रह को उसकी कक्षा (Orbit) में स्थापित करते हैं।
हर मिशन के लिए नया PSLV क्यों नहीं बनाया जाता?
इसरो हर मिशन के लिए नया पीएसएलवी नहीं बनाता। पीएसएलवी की मुख्य संरचना और तकनीकी उपकरण पुनः उपयोग किए जा सकते हैं। केवल जरूरत के हिसाब से कुछ मॉड्यूल्स को अपग्रेड किया जाता है। इससे समय और खर्च की बचत होती है।
उदाहरण के लिए, स्पेडेक्स (SPADEX) मिशन के लिए पीएसएलवी-सी60 का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मिशन में दो स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में ले जाकर डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन किया जाएगा।
स्पेस में जाने वाला हिस्सा कैसे वापस आता है?
पीएसएलवी लॉन्च के बाद इसके तीन हिस्से समुद्र में गिर जाते हैं।
पहली स्टेज: लॉन्च के तुरंत बाद अलग होकर समुद्र में गिरती है।
दूसरी स्टेज: थोड़ी ऊंचाई तक पहुंचने के बाद अलग होती है और गिर जाती है।
तीसरी स्टेज: ये भी रॉकेट की गति बढ़ाने के बाद पृथ्वी पर गिर जाती है।
चौथी स्टेज, जिसे “पेलोड” के नीचे का हिस्सा कहा जाता है, अंतरिक्ष में अपनी कक्षा में रह जाता है। हालांकि, पहले ये अंतरिक्ष में कचरा बन जाता था। अब इसरो ने इसे भी नियंत्रित करने के लिए तकनीक विकसित की है, जिससे ये पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर नष्ट हो जाता है।
स्पेसक्राफ्ट और डॉकिंग मिशन की खासियत
स्पेडेक्स मिशन के तहत इसरो दो स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में भेज रहा है। ये दोनों 28,800 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से यात्रा करेंगे। इसरो इन्हें धीमा करके आपस में जोड़ने (Docking) का प्रदर्शन करेगा। ये मिशन सफल होने पर भारत रूस, अमेरिका और चीन के बाद डॉकिंग तकनीक में सफलता पाने वाला चौथा देश बन जाएगा।
पीएसएलवी एक बेहद मजबूत और भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल है, जो भारत के अंतरिक्ष मिशनों की रीढ़ बना हुआ है। हर मिशन के लिए नया पीएसएलवी बनाने की बजाय इसका पुनः उपयोग किया जाता है। साथ ही, इसरो ने अंतरिक्ष में कचरा कम करने की दिशा में भी बड़े कदम उठाए हैं। ये भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को दर्शाता है।
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