महाराष्ट्र के लातूर जिले से बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया है। यहां 89 वर्षीय महिला ने अपने पोते और पड़पोते को कृषि भूमि उपहार स्वरूप सौंप दी थी, लेकिन जमीन मिलने के बाद उन्होंने बुजुर्ग महिला की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई। मामला वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल तक पहुंचा, जहां सुनवाई के बाद गिफ्ट डीड को रद्द कर महिला के संपत्ति अधिकार बहाल कर दिए गए।
क्या है पूरा मामला?
लातूर जिले के करसा गांव की रहने वाली 89 वर्षीय हौसाबाई लहाड़े ने अपनी करीब तीन हेक्टेयर (लगभग साढ़े 7 एकड़) कृषि भूमि अपने पोते और पड़पोते के नाम रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के जरिए हस्तांतरित कर दी थी। भूमि हस्तांतरण के पीछे ये उम्मीद थी कि परिवार के सदस्य उनकी वृद्धावस्था में देखभाल करेंगे और उन्हें आवश्यक सहयोग प्रदान करेंगे। हालांकि, आरोप है कि जमीन मिलने के बाद दोनों ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया और बुजुर्ग महिला को पर्याप्त देखभाल नहीं मिली।
ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया
परिजनों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के बाद महिला ने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान ये पाया गया कि जिन शर्तों और विश्वास के आधार पर संपत्ति हस्तांतरित की गई थी, उनका पालन नहीं किया गया।
ट्रिब्यूनल ने क्या कहा?
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संपत्ति हस्तांतरण के ऐसे मामलों में ये कानूनी रूप से लागू होने वाली शर्त भी मानी जाती है। यदि संपत्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति बुजुर्ग की देखभाल करने में विफल रहता है, तो ऐसे हस्तांतरण को निरस्त किया जा सकता है। इसी आधार पर गिफ्ट डीड को रद्द करते हुए महिला के संपत्ति अधिकार पुनः बहाल कर दिए गए।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण संदेश
ये फैसला उन बुजुर्गों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो अपनी संपत्ति बच्चों या रिश्तेदारों के नाम कर देते हैं और बाद में उपेक्षा का सामना करते हैं। कानून वरिष्ठ नागरिकों को ये अधिकार देता है कि यदि संपत्ति लेने वाला व्यक्ति देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाता है, तो संपत्ति हस्तांतरण को चुनौती दी जा सकती है।
लातूर का ये मामला बताता है कि बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून में पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। संपत्ति के बदले देखभाल का वादा पूरा नहीं होने पर वरिष्ठ नागरिक न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से अपने अधिकार वापस हासिल कर सकते हैं। ये फैसला न केवल एक 89 वर्षीय महिला के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि समाज को ये संदेश भी देता है कि बुजुर्गों की उपेक्षा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई संभव है।
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