US-ईरान जंग: मध्य पूर्व में एक बार फिर बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव तेज होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। निवेशकों को आशंका है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तथा तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर दुनिया भर में महंगाई, परिवहन लागत और आर्थिक विकास पर भी पड़ सकता है।
क्यों बढ़ रही हैं कच्चे तेल की कीमतें?
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक बाजार में तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर बढ़ी चिंता ने बाजार में घबराहट बढ़ा दी है। दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
क्या 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है क्रूड?
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है, तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होती है या आपूर्ति में बड़ी रुकावट आती है, तो ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकता है। हालांकि ये केवल एक संभावित परिदृश्य है, क्योंकि कीमतें पूरी तरह भू-राजनीतिक घटनाक्रम, वैश्विक मांग और प्रमुख तेल उत्पादक देशों की रणनीति पर निर्भर करेंगी।
दुनिया भर में महंगाई बढ़ने का खतरा
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और परिवहन लागत पर पड़ता है। जब ईंधन महंगा होता है तो माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है, जिसका प्रभाव खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक पर देखने को मिलता है। ऐसे में कई देशों में महंगाई फिर से बढ़ सकती है और केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरें ऊंची रखने का दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक क्रूड महंगा रहता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन खर्च और कई जरूरी वस्तुओं की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। सरकार और तेल विपणन कंपनियां वैश्विक हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
निवेशकों की नजर अब अगले घटनाक्रम पर
फिलहाल वैश्विक बाजार की नजर अमेरिका-ईरान के बीच आगे होने वाले घटनाक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और तेल आपूर्ति पर बनी हुई है। यदि तनाव कम होता है तो कीमतों में नरमी आ सकती है, लेकिन संघर्ष बढ़ने की स्थिति में ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और तेज हो सकती है। यही कारण है कि पूरी दुनिया की नजर इस समय मध्य पूर्व की स्थिति पर टिकी हुई है।
























