Supreme Court of India ने इच्छा मृत्यु से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया को लेकर अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ये फैसला जस्टिस Justice J. B. Pardiwala की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया। अदालत के इस निर्णय को भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े कानून और चिकित्सा नैतिकता के लिहाज से ऐतिहासिक माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
इच्छा मृत्यु (Euthanasia) से जुड़े इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी असाध्य बीमारी से जूझ रहे मरीज को गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी संविधान के व्यापक दायरे में देखा जा सकता है। अदालत ने ये भी कहा कि कुछ परिस्थितियों में लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए सख्त चिकित्सा और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाली चिकित्सा प्रक्रियाओं को लेकर स्पष्ट नियम होना जरूरी है, ताकि मरीज की गरिमा और उसकी इच्छा का सम्मान किया जा सके।
क्लिनिकल न्यूट्रिशन को माना गया मेडिकल ट्रीटमेंट
अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण बिंदु पर स्पष्टता दी। कोर्ट ने कहा कि क्लिनिकल असिस्टेड न्यूट्रिशन (जैसे ट्यूब के जरिए भोजन या पोषण देना) भी एक प्रकार का मेडिकल ट्रीटमेंट है। इसका मतलब ये हुआ कि अगर मरीज की स्थिति और कानूनी प्रक्रिया इसकी अनुमति देती है, तो इस प्रकार की चिकित्सा सहायता को भी हटाने पर विचार किया जा सकता है।
लाइफ सपोर्ट हटाने के लिए तय प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि लाइफ सपोर्ट हटाने का निर्णय कोई एक व्यक्ति या डॉक्टर अकेले नहीं ले सकता। इसके लिए कई स्तर की प्रक्रिया तय की गई है, जिनमें शामिल हैं:
मरीज की मेडिकल स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन
डॉक्टरों की विशेषज्ञ समिति की राय
परिवार की सहमति और इच्छा
कानूनी दिशा-निर्देशों का पालन
अदालत ने कहा कि इन सभी चरणों का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि किसी भी मरीज के साथ अन्याय न हो और उसका निर्णय पूरी तरह पारदर्शी और नैतिक तरीके से लिया जाए।
गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर जोर
पीठ ने अपने फैसले में ये भी कहा कि किसी व्यक्ति को जीवन के साथ-साथ मृत्यु में भी गरिमा मिलनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से असाध्य बीमारी, असहनीय दर्द या स्थायी कोमा जैसी स्थिति में है, तो उसके उपचार से जुड़े फैसले संवेदनशीलता और स्पष्ट नियमों के आधार पर लिए जाने चाहिए।
चिकित्सा और कानून के लिए महत्वपूर्ण फैसला
विशेषज्ञों का मानना है कि ये फैसला भारत में चिकित्सा नैतिकता, मरीजों के अधिकार और अस्पतालों की जिम्मेदारी को लेकर नई स्पष्टता प्रदान करेगा। इससे डॉक्टरों, मरीजों और उनके परिवारों के लिए कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
इस फैसले के बाद देश में इच्छा मृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को लेकर बहस और भी तेज होने की संभावना है। वहीं, चिकित्सा क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि स्पष्ट दिशा-निर्देश होने से भविष्य में ऐसे मामलों में भ्रम की स्थिति कम होगी।
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