नेपाल में तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के जन्मदिन के आयोजन को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे ने न केवल देश की आंतरिक राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि नेपाल की विदेश नीति और चीन के साथ उसके संबंधों को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
नेपाल के पूर्व उपप्रधानमंत्री और चीन समर्थक माने जाने वाले वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता नारायण काजी श्रेष्ठ ने सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी है कि यदि नेपाल अपनी पारंपरिक कूटनीतिक नीति से भटकता है, तो इसका असर देश की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पड़ सकता है।
दलाई लामा के जन्मदिन समारोह से शुरू हुआ विवाद
काठमांडू में दलाई लामा के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कई विदेशी राजनयिकों की मौजूदगी के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई। इस आयोजन को लेकर चीन समर्थक नेताओं ने आपत्ति जताई और इसे नेपाल की विदेश नीति में बदलाव का संकेत बताया।
नारायण काजी श्रेष्ठ का कहना है कि इस तरह के आयोजनों को सरकारी स्तर पर अनुमति मिलना केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विदेश नीति से जुड़ा एक संवेदनशील मामला है।
पूर्व विदेश मंत्री ने सरकार को दी कड़ी चेतावनी
पूर्व विदेश मंत्री नारायण काजी श्रेष्ठ ने सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में कहा कि नेपाल लंबे समय से स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति का पालन करता आया है। उनके अनुसार, यदि सरकार विदेशी शक्तियों के रणनीतिक हितों के अनुसार फैसले लेने लगेगी, तो इससे देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने सरकार से अपील की कि वो ऐसे किसी भी कदम से बचे, जिससे नेपाल की पारंपरिक विदेश नीति पर सवाल खड़े हों।
चीन के साथ रिश्तों को लेकर बढ़ी चिंता
नेपाल में चीन समर्थक राजनीतिक वर्ग का मानना है कि दलाई लामा से जुड़े आयोजनों को बढ़ावा देने से बीजिंग के साथ संबंधों में तनाव पैदा हो सकता है।
चीन दलाई लामा को तिब्बत से जुड़े राजनीतिक मुद्दे का केंद्र मानता है और लंबे समय से नेपाल से अपेक्षा करता रहा है कि उसकी भूमि का उपयोग चीन विरोधी गतिविधियों के लिए न होने दिया जाए।
इसी वजह से दलाई लामा से जुड़े किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम को चीन बेहद संवेदनशील दृष्टि से देखता है।
पूर्व राजदूतों ने भी सरकार को किया आगाह
चीन में नेपाल के पूर्व राजदूतों के एक समूह ने भी सरकार को सलाह दी है कि वो “एक चीन नीति” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से बनाए रखे।
पूर्व राजनयिकों का कहना है कि नेपाल की विदेश नीति का आधार हमेशा संतुलित संबंध और पड़ोसी देशों के साथ विश्वास कायम रखना रहा है। यदि इस नीति से विचलन होता है, तो इसका असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि हाल ही में नेपाली विदेश मंत्री की चीन यात्रा के दौरान भी नेपाल ने “एक चीन नीति” के समर्थन का भरोसा दिया था।
Ever since the interim government led by Sushila Karki and the current government led by Balen received congratulatory messages from the Dalai Lama and his self-proclaimed government, serious concerns and widespread discussions have emerged in Nepal regarding the implications of…
— Narayan Kaji Shrestha Prakash (@narayankajis) July 8, 2026
आखिर क्या है ‘एक चीन नीति’?
“एक चीन नीति” वह सिद्धांत है जिसके तहत चीन यह मानता है कि ताइवान और तिब्बत सहित पूरा क्षेत्र एक ही चीन का हिस्सा है।
नेपाल सहित दुनिया के अधिकांश देशों ने आधिकारिक रूप से इसी नीति को स्वीकार किया है। नेपाल लंबे समय से यह आश्वासन देता रहा है कि उसकी भूमि का इस्तेमाल किसी भी पड़ोसी देश के खिलाफ गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।
दलाई लामा को लेकर क्यों संवेदनशील है चीन?
दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। वर्ष 1959 में तिब्बत छोड़ने के बाद वे भारत में रह रहे हैं और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से तिब्बती समुदाय का नेतृत्व करते हैं।
चीन उन्हें अलगाववाद से जोड़कर देखता है, जबकि उनके समर्थक उन्हें शांति और अहिंसा का प्रतीक मानते हैं। यही कारण है कि दलाई लामा से जुड़ी किसी भी गतिविधि पर चीन की विशेष नजर रहती है।
नेपाल की विदेश नीति पर फिर शुरू हुई बहस
दलाई लामा के जन्मदिन समारोह के बाद नेपाल में यह बहस तेज हो गई है कि सरकार को पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्तों में किस तरह का संतुलन बनाए रखना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की भौगोलिक स्थिति और भारत-चीन जैसे दो बड़े पड़ोसियों के बीच मौजूद रणनीतिक महत्व को देखते हुए उसकी विदेश नीति हमेशा संतुलित और सावधानीपूर्ण रही है। ऐसे में किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर उठाया गया कदम क्षेत्रीय कूटनीति को प्रभावित कर सकता है।
दलाई लामा के जन्मदिन के आयोजन ने नेपाल में राजनीतिक और कूटनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। चीन समर्थक नेताओं और पूर्व राजनयिकों ने सरकार को “एक चीन नीति” का पालन करने और विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने की सलाह दी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नेपाल इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी पारंपरिक कूटनीतिक नीति को किस तरह आगे बढ़ाता है और चीन के साथ अपने संबंधों को कैसे संतुलित रखता है।



















