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Nafisa Joseph case: 22 साल बाद बॉम्बे HC का बड़ा फैसला, पूर्व मंगेतर को नहीं मिली राहत

Nafisa Joseph
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Nafisa Joseph case: मॉडल और 1997 की Miss India Universe विजेता नफीसा जोसेफ की मौत से जुड़े करीब 22 साल पुराने मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने उनके पूर्व मंगेतर और कारोबारी गौतम खंडूजा को मामले से डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया है। इसका मतलब है कि उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही फिलहाल जारी रहेगी।

न्यायमूर्ति मिलिंद साठे ने 10 सितंबर 2026 के फैसले में कहा कि मामले में ऐसे पर्याप्त आधार और परिस्थितियां मौजूद हैं, जिनके चलते ट्रायल आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस स्तर पर ये तय नहीं किया है कि आरोपी दोषी हैं या नहीं। ये फैसला केवल इस बात पर है कि क्या उनके खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनता है और क्या उन्हें ट्रायल का सामना करना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

नफीसा जोसेफ (Nafisa Joseph) और गौतम खंडूजा की मुलाकात 2003 में हुई थी और दोनों ने 23 मई 2004 को सगाई की थी। उनकी शादी अगस्त 2004 में तय थी और शादी के कार्ड भी बांटे जा चुके थे।

मामले के मुताबिक, नफीसा को बताया गया था कि गौतम का अपनी पत्नी से तलाक हो चुका है। बाद में उन्हें कथित तौर पर पता चला कि तलाक की स्थिति वैसी नहीं थी, जैसा उन्हें बताया गया था। इस बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ।

शादी से कुछ दिन पहले गौतम ने नफीसा से शादी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद नफीसा की मां भी बेंगलुरु से मुंबई पहुंचीं। कोर्ट में पेश किए गए रिकॉर्ड के अनुसार, परिवार के सामने भी शादी से इनकार किया गया था।

इसके बाद क्या हुआ?

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, 28 जुलाई को नफीसा की मां मुंबई में थीं। अगले दिन नफीसा की एक दोस्त उनसे मिलने पहुंची। उस समय वो बेहद परेशान बताई गई थीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, नफीसा ने डॉक्टर से मिलने से इनकार किया और कहा कि अगर गौतम उनके साथ जाएं तो वो डॉक्टर को दिखाएंगी। दोस्त की ओर से गौतम से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन वो नहीं आए। इसके बाद नफीसा ने अपनी जान ले ली।

उनकी मौत के बाद परिवार की शिकायत पर गौतम खंडूजा के खिलाफ IPC की धारा 306, यानी आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। बाद में चार्जशीट दाखिल हुई और मामला अदालत तक पहुंचा।

गौतम खंडूजा ने क्या दलील दी?

गौतम खंडूजा की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि चार्जशीट में उनके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने, धमकी देने, दबाव बनाने, अपमानित करने या जानबूझकर मदद करने जैसा कोई स्पष्ट कृत्य नहीं बताया गया है। उनकी ओर से इसी आधार पर मामले से डिस्चार्ज किए जाने की मांग की गई थी।

कोर्ट ने क्यों खारिज की डिस्चार्ज याचिका?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि डिस्चार्ज की अर्जी पर सुनवाई के दौरान अदालत यो तय नहीं कर सकती कि आरोपी अंततः दोषी साबित होंगे या नहीं। इस चरण पर केवल ये देखना होता है कि क्या प्रथमदृष्टया मामला बनता है और क्या आरोपी के खिलाफ ट्रायल आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध बयानों और खास तौर पर नफीसा की मौत से ठीक पहले की परिस्थितियों को देखते हुए इस स्तर पर ये नहीं कहा जा सकता कि IPC की धारा 306 के तहत मामला पूरी तरह नहीं बनता।

कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की कि शादी से इनकार और तलाक से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध न कराने का असर नफीसा पर कितना पड़ा और क्या ये परिस्थितियां उनकी मौत की वजह बनने वाली अंतिम कड़ी थीं, इसका फैसला ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।

22 साल बाद भी मामला क्यों अहम है?

नफीसा जोसेफ (Nafisa Joseph) की मौत 2004 में हुई थी। इसके बाद मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। नवंबर 2005 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने ट्रायल पर रोक लगा दी थी। अब अदालत ने गौतम खंडूजा को डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया है और मामले को ट्रायल के स्तर पर आगे बढ़ने की अनुमति दी है, हालांकि अंतरिम रोक को छह सप्ताह तक जारी रखा गया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का ताजा फैसला गौतम खंडूजा को दोषी ठहराने वाला फैसला नहीं है। अदालत ने सिर्फ ये माना है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इस चरण पर उन्हें मामले से बाहर नहीं किया जा सकता और आरोपों की पूरी जांच ट्रायल के दौरान होनी चाहिए।

इसलिए अब इस 22 साल पुराने मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और ट्रायल के दौरान सामने आने वाले सबूत महत्वपूर्ण होंगे।

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