नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स में बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जबकि डीजल के निर्यात पर टैक्स बढ़ाकर 11.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसके अलावा विमान ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर 11 रुपये प्रति लीटर की दर से टैक्स जारी रहेगा। नई दरें 1 नवंबर 2026 से लागू होंगी।
सरकार ने ये फैसला ऐसे समय में लिया है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम घरेलू ऊर्जा बाजार और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर पड़ने वाले प्रभाव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर कितना बदला टैक्स?
सरकारी अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स की नई दरें इस प्रकार हैं:
| पेट्रोलियम उत्पाद | पुरानी दर | नई दर |
|---|---|---|
| पेट्रोल | ₹2.50 प्रति लीटर | शून्य |
| डीजल | ₹8 प्रति लीटर | ₹11.50 प्रति लीटर |
| ATF (विमान ईंधन) | ₹11 प्रति लीटर | ₹11 प्रति लीटर |
इस बदलाव के बाद पेट्रोल का निर्यात करने वाली रिफाइनरी कंपनियों को अब इस मद में कोई विंडफॉल टैक्स नहीं देना होगा। वहीं डीजल निर्यात करने वाली कंपनियों पर प्रति लीटर 3.50 रुपये का अतिरिक्त टैक्स बोझ पड़ेगा।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध पेट्रोल और डीजल पर लागू मौजूदा शुल्क दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यानी यह फैसला मुख्य रूप से निर्यात किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगा।
क्या होता है विंडफॉल टैक्स और सरकार इसे क्यों लगाती है?
विंडफॉल टैक्स एक ऐसा विशेष कर है, जो किसी उद्योग या कंपनी को सामान्य परिस्थितियों से काफी ज्यादा मुनाफा होने पर लगाया जाता है। पेट्रोलियम क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर रिफाइनरी कंपनियों को पेट्रोल और डीजल के निर्यात से अतिरिक्त कमाई हो सकती है।
ऐसी स्थिति में सरकार निर्यात पर विंडफॉल टैक्स लगाकर इस अतिरिक्त मुनाफे का एक हिस्सा राजस्व के रूप में प्राप्त करती है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता और कीमतों के बीच संतुलन बनाए रखना भी है।
सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और पिछले 15 दिनों के औसत भाव की समीक्षा के आधार पर इस टैक्स की दरों में बदलाव करती है। इसी प्रक्रिया के तहत पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर नई दरें तय की गई हैं।
अक्टूबर में कच्चे तेल की कीमतों में 14 फीसदी उछाल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में अक्टूबर के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में करीब 14 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 113.4 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बंद हुई थी। वहीं, इंडियन बास्केट क्रूड की कीमत भी 114.6 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।
गोल्डमैन सैक्स के अनुमान के मुताबिक, अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तथा तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। वहीं, हालात सामान्य होने पर इसकी कीमत घटकर 80 डॉलर प्रति बैरल तक आने की संभावना जताई गई है।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
भारत किन देशों को पेट्रोल और डीजल बेचता है?
भारत दुनिया के प्रमुख पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक देशों में शामिल है। देश की रिफाइनरियां कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल, नेफ्था और फ्यूल ऑयल जैसे उत्पाद तैयार करती हैं और इनका निर्यात करती हैं।
पेट्रोलियम उत्पादों के कुल निर्यात में डीजल की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी और पेट्रोल की हिस्सेदारी लगभग 23 फीसदी बताई गई है।
भारत से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में रिलायंस इंडस्ट्रीज की बड़ी भूमिका है। कुल निर्यात में कंपनी की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी बताई गई है। इसके अलावा रूस के निवेश वाली नायरा एनर्जी, सरकारी कंपनी मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) और दूसरी रिफाइनरी कंपनियां भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करती हैं।
क्या पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा असर?
सरकार के इस फैसले का सीधा संबंध पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर लगने वाले टैक्स से है। घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा शुल्क दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
इसलिए केवल विंडफॉल टैक्स में बदलाव के आधार पर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी या कटौती का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है तो आने वाले समय में भारत के आयात बिल, रिफाइनरी कंपनियों की लागत और पेट्रोलियम क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, सरकार के नए फैसले से पेट्रोल निर्यातकों को टैक्स में राहत मिली है, जबकि डीजल निर्यात करने वाली कंपनियों पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ बढ़ा है। नई दरें 1 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी।





























