मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें अदालत के सामने रखीं। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि जिस स्थल पर सदियों से नमाज अदा की जाती रही, वहां धार्मिक गतिविधियां रोक दी गई हैं। वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सभी पक्षों से संयमित भाषा का इस्तेमाल करने और अदालत के बाहर किसी भी प्रकार का गलत संदेश जाने से बचने की अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये मामला पहली बार उसकी सुनवाई में आया है और अदालत इस पर जल्द से जल्द सुनवाई करने का प्रयास करेगी।
मुस्लिम पक्ष ने क्या कहा?
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने अदालत में कहा कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद पहले से चली आ रही व्यवस्था बदल गई है। उनके अनुसार, मुस्लिम समुदाय को संबंधित स्थल पर धार्मिक गतिविधियां करने से पूरी तरह वंचित कर दिया गया और उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का पर्याप्त अवसर भी नहीं मिला।
मुस्लिम पक्ष का कहना था कि लंबे समय से वहां नमाज अदा की जाती रही है और वर्तमान व्यवस्था में इस पर रोक लगना उनके धार्मिक अधिकारों को प्रभावित करता है।
अभिषेक मनु सिंघवी ने दी सौहार्द बनाए रखने की दलील
मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में कहा कि इतिहास से जुड़े विवादों को वर्तमान में नए विवादों का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी के प्रसिद्ध कथन “एक आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देती है” का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि पुराने ऐतिहासिक दावों के आधार पर वर्तमान व्यवस्था बदली जाने लगी तो इससे कई अन्य ऐतिहासिक स्मारकों और स्थलों पर भी विवाद खड़े हो सकते हैं।
सिंघवी ने ये भी कहा कि पहले की व्यवस्था में नमाज के साथ-साथ बसंत पंचमी और मंगलवार को पूजा भी होती थी, जो धार्मिक सौहार्द का उदाहरण थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि अंतिम निर्णय आने तक पुरानी व्यवस्था बहाल रखने पर विचार किया जाए।
सरकार की ओर से क्या रखा गया पक्ष?
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद लगभग दो महीने बीत चुके हैं और प्रशासन ने उसी के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में वहां शांति और कानून-व्यवस्था बनी हुई है।
सरकार का कहना था कि मौजूदा परिस्थितियों में कई प्रशासनिक बदलाव हो चुके हैं, जिन्हें भी अदालत के सामने ध्यान में रखा जाना चाहिए।
मुस्लिम पक्ष की दूसरी दलील
मुस्लिम पक्ष की वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत में कहा कि वर्ष 1995 में दोनों समुदायों के बीच आपसी सहमति से धार्मिक गतिविधियों को लेकर एक व्यवस्था बनी थी। उनके अनुसार, उस व्यवस्था को अचानक बदलना उचित नहीं था।
उन्होंने ये भी कहा कि संबंधित मस्जिद में कई सदियों से नमाज अदा की जाती रही है और इस धार्मिक गतिविधि को रोकना अत्यंत कठोर कदम माना जाना चाहिए।
CJI ने क्यों दी संयम बरतने की सलाह?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने दोनों पक्षों से कहा कि अदालत में दिए गए बयान सार्वजनिक रूप से अलग अर्थों में लिए जा सकते हैं। इसलिए सभी पक्षों को अपनी दलीलें पूरी जिम्मेदारी और संयम के साथ प्रस्तुत करनी चाहिए ताकि समाज में किसी प्रकार का तनाव या गलत संदेश न पहुंचे।
उन्होंने ये भी उल्लेख किया कि इस मामले की पूर्व सुनवाई के दौरान भी वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस बात का विशेष ध्यान रखा था कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सामाजिक सौहार्द प्रभावित न हो।
पुराने आदेशों का भी दिया गया हवाला
मुस्लिम पक्ष ने अदालत के सामने वर्ष 1935 और 1951 के कुछ पुराने आदेशों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि इन दस्तावेजों के आधार पर पूर्व की व्यवस्था को बहाल किया जा सकता है। हालांकि इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय अभी सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया जाना बाकी है।
फिलहाल क्या है स्थिति?
धार भोजशाला विवाद फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अदालत ने अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय सभी पक्षों की दलीलें सुनने की प्रक्रिया जारी रखी है। दोनों पक्षों ने अपने-अपने ऐतिहासिक, कानूनी और धार्मिक तर्क अदालत के समक्ष रखे हैं। अब आगे की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही कोई निर्णय देगा।


























