मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। यहां एशिया के कुछ सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हैं तो दूसरी तरफ अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस निजी अस्पतालों का विशाल नेटवर्क भी मौजूद है। लेकिन जब किसी आम आदमी के घर में कोई बीमार पड़ता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि इलाज कहां करवाया जाए?
सरकारी अस्पताल सस्ते हैं, लेकिन भीड़ बहुत है। निजी अस्पतालों में सुविधाएं बेहतर हैं, लेकिन खर्च इतना अधिक है कि कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं। ऐसे में आम नागरिक के सामने विकल्प कम और मजबूरियां ज्यादा दिखाई देती हैं।
सरकारी अस्पताल: कम खर्च, लेकिन लंबा इंतजार
मुंबई के बीएमसी अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हर साल करोड़ों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। बीएमसी के अनुसार उसके अस्पतालों में सालाना 1.8 करोड़ से अधिक ओपीडी मरीज और लाखों इनडोर मरीजों का इलाज किया जाता है।
सरकारी अस्पतालों की सबसे बड़ी ताकत ये है कि यहां कम लागत में इलाज उपलब्ध होता है। गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए यही सबसे बड़ा सहारा हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। मरीजों की भारी संख्या के कारण लंबी कतारें, बेड की कमी, डॉक्टरों पर बढ़ता दबाव और जांच के लिए इंतजार जैसी समस्याएं अक्सर सामने आती हैं। कई इलाकों में लोगों को नजदीक में सरकारी अस्पताल तक उपलब्ध नहीं है।
निजी अस्पताल: बेहतर सुविधा, लेकिन भारी खर्च
मुंबई में निजी अस्पतालों का तेजी से विस्तार हो रहा है। शहर में सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों में बेड की संख्या लगभग दोगुनी है।
निजी अस्पतालों में आमतौर पर इंतजार का समय कम होता है। आधुनिक मशीनें उपलब्ध हैं। बेहतर कमरे और सुविधाएं, और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक जल्दी पहुंच जैसी सुविधाएं मिलती हैं।
लेकिन इन सुविधाओं की कीमत भी चुकानी पड़ती है। एक सामान्य भर्ती से लेकर सर्जरी तक का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। कई परिवारों को इलाज के लिए बचत तोड़नी पड़ती है, कर्ज लेना पड़ता है या संपत्ति तक बेचनी पड़ती है। महाराष्ट्र में स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा आज भी लोगों को अपनी जेब से ही देना पड़ता है।
आखिर लोग निजी अस्पतालों को क्यों चुनते हैं?
एक दिलचस्प तथ्य ये है कि महाराष्ट्र में केवल लगभग 18-19 प्रतिशत मरीज ही सरकारी अस्पतालों का उपयोग करते हैं, जबकि अधिकांश मरीज निजी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं।
इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं:
- सरकारी अस्पतालों में भीड़
- लंबा इंतजार
- बेड और स्टाफ की कमी
- सुविधाओं को लेकर धारणा
- आपातकालीन स्थिति में तत्काल इलाज की जरूरत
हालांकि इसका परिणाम ये होता है कि इलाज का आर्थिक बोझ सीधे परिवारों पर पड़ता है।
आम आदमी की सबसे बड़ी दुविधा
मुंबई के एक मजदूर, रिक्शा चालक, सुरक्षा गार्ड या छोटे कर्मचारी के लिए बीमारी सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं बल्कि आर्थिक संकट का विषय बन जाती है।
अगर सरकारी अस्पताल जाएं तो समय और भीड़ की चुनौती है।
अगर निजी अस्पताल जाएं तो खर्च की चिंता है।
यही वजह है कि कई लोग बीमारी बढ़ने तक इलाज टालते रहते हैं। जब तक अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक बीमारी गंभीर हो चुकी होती है।
क्या स्वास्थ्य योजनाएं समाधान हैं?
सरकार ने आयुष्मान भारत और महात्मा ज्योतिबा फुले जन आरोग्य योजना जैसी स्वास्थ्य योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन कई मामलों में मरीजों को योजना का लाभ लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कुछ रिपोर्टों में योजना के तहत इलाज से इनकार किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
असली सवाल: इलाज सुविधा है या अधिकार?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, बेड, आधुनिक उपकरण और बेहतर प्रबंधन उपलब्ध कराया जाए तो बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों पर निर्भर नहीं रहेंगे।
मुंबई के सरकारी अस्पताल आज भी लाखों गरीब परिवारों की जीवनरेखा हैं। वहीं निजी अस्पताल आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चुनौती दोनों के बीच संतुलन बनाने की है।
मुंबई में आम आदमी के लिए अस्पताल का चुनाव केवल इलाज का फैसला नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति से जुड़ा निर्णय है।
जिसके पास पैसा है, वो निजी अस्पताल की ओर जाता है। जिसके पास सीमित संसाधन हैं, उसके लिए सरकारी अस्पताल ही उम्मीद बनते हैं।
लेकिन एक आदर्श शहर वही होगा जहां किसी नागरिक को इलाज के लिए अपनी बचत, अपना घर या अपना भविष्य दांव पर न लगाना पड़े। स्वास्थ्य सेवा सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार बने – यही मुंबई और देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
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