महंगे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद खरीदने के बाद ग्राहक ये उम्मीद करता है कि वो लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के उसका इस्तेमाल कर सके। लेकिन जब नया उत्पाद वारंटी अवधि के दौरान ही बार-बार खराब होने लगे और कंपनी कई शिकायतों के बावजूद समस्या का समाधान न कर पाए, तो उपभोक्ता के पास कानूनी कार्रवाई का अधिकार होता है। ऐसा ही एक मामला हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से सामने आया है, जहां कंज्यूमर कोर्ट ने HP इंडिया के खिलाफ फैसला सुनाते हुए एक ग्राहक को लैपटॉप की पूरी कीमत, मुआवजा और ब्याज देने का आदेश दिया है।
5 महीने में शुरू हो गईं लैपटॉप की समस्याएं
पालमपुर निवासी विवेक भट्ट ने 8 सितंबर 2024 को चंडीगढ़ स्थित जेटेज कंप्यूटर ट्रेडर्स से HP लैपटॉप (मॉडल 15S-EQ2084AU) खरीदा था। इस लैपटॉप की कीमत 49,000 रुपये थी और कंपनी की ओर से एक वर्ष की वारंटी दी गई थी।
खरीदारी के करीब पांच महीने बाद ही लैपटॉप में लगातार तकनीकी दिक्कतें आने लगीं। सबसे पहले स्क्रीन फ्लिकरिंग (बार-बार स्क्रीन का झिलमिलाना) की समस्या सामने आई। इसके साथ ही बैटरी तेजी से डिस्चार्ज होने लगी, जिससे सामान्य काम करना भी मुश्किल हो गया।
कई बार शिकायत के बावजूद नहीं हुआ समाधान
ग्राहक ने वारंटी के तहत HP से संपर्क किया, जिसके बाद कंपनी ने बैटरी बदल दी। हालांकि बैटरी बदलने के बाद भी स्क्रीन फ्लिकरिंग और सिस्टम क्रैश जैसी समस्याएं खत्म नहीं हुईं।
इसके बाद विवेक भट्ट ने अलग-अलग तारीखों पर कई ऑनलाइन सर्विस रिक्वेस्ट दर्ज कराईं, लेकिन हर बार समस्या जस की तस बनी रही। लगातार शिकायतों और सर्विस विजिट के बावजूद लैपटॉप पूरी तरह ठीक नहीं हो सका।
टेक्निशियन ने माना मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट
मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब अंतिम सर्विस निरीक्षण के दौरान HP के टेक्निशियन ने स्वीकार किया कि लैपटॉप में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (निर्माण संबंधी खामी) है। बताया गया कि ये ऐसी तकनीकी खराबी है, जिसे सामान्य मरम्मत से ठीक नहीं किया जा सकता।
जब कंपनी की ओर से स्थायी समाधान नहीं मिला, तब विवेक भट्ट ने कांगड़ा जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) में शिकायत दर्ज कराई और लैपटॉप की कीमत वापस करने के साथ मुआवजे की मांग की।
कोर्ट ने माना सेवा में कमी
मामले की सुनवाई कांगड़ा जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने की। आयोग के अध्यक्ष हिमांशु मिश्रा तथा सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुर की पीठ ने उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन किया।
सुनवाई के दौरान शुरुआत में HP कंपनी आयोग के सामने पेश हुई, लेकिन बाद में कार्यवाही में शामिल नहीं हुई। इसके बाद आयोग ने कंपनी के खिलाफ एक्स-पार्टी (एकतरफा) सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज और साक्ष्य विश्वसनीय हैं तथा उन्हें खारिज करने का कोई कारण नहीं है। आयोग ने ये भी माना कि वारंटी अवधि के दौरान बार-बार खराब होने वाले महंगे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद को ठीक न कर पाना सेवा में कमी (Deficiency in Service) और अनुचित व्यापारिक व्यवहार (Unfair Trade Practice) की श्रेणी में आता है।
HP को क्या आदेश दिया गया?
कंज्यूमर कोर्ट ने HP इंडिया सेल्स प्राइवेट लिमिटेड को निर्देश दिया कि वो ग्राहक को लैपटॉप की पूरी खरीद कीमत 49,000 रुपये वापस करे।
इसके अलावा आयोग ने आदेश दिया कि –
- शिकायत दर्ज होने की तारीख से भुगतान होने तक 9% वार्षिक ब्याज दिया जाए।
- मानसिक परेशानी और असुविधा के लिए 5,000 रुपये का मुआवजा दिया जाए।
- मुकदमे के खर्च के रूप में 5,000 रुपये अलग से भुगतान किए जाएं।
इस तरह ग्राहक को कुल 59,000 रुपये, इसके अतिरिक्त 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी मिलेगा।
उपभोक्ताओं के लिए क्या है सीख?
ये फैसला उन सभी उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो वारंटी अवधि में उत्पाद खराब होने के बावजूद उचित समाधान नहीं मिलने से परेशान रहते हैं। यदि कोई कंपनी बार-बार शिकायत के बाद भी समस्या का समाधान नहीं करती और उत्पाद में निर्माण संबंधी खामी साबित होती है, तो उपभोक्ता कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
ये मामला साबित करता है कि उपभोक्ता संरक्षण कानून केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सही दस्तावेज और ठोस सबूत होने पर उपभोक्ताओं को न्याय भी मिलता है। यदि किसी कंपनी की लापरवाही के कारण ग्राहक को आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ती है, तो कंज्यूमर कोर्ट उसके हितों की रक्षा करने के लिए प्रभावी कार्रवाई कर सकता है।
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