पश्चिम बंगाल के पहले चरण के मतदान ने न केवल राज्य, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक इतिहास को बदल कर रख दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अनुसार, 152 सीटों पर हुआ 92.72% मतदान आजादी के बाद भारत के किसी भी चुनाव में सर्वाधिक है। महज कुछ दिन पहले 9 अप्रैल को पुडुचेरी ने 89.87% वोटिंग का जो कीर्तिमान स्थापित किया था, उसे बंगाल की जनता ने एक ही झटके में पीछे छोड़ दिया।
आंकड़ों की जुबानी: 2021 के मुकाबले 11% की भारी उछाल
पिछले विधानसभा चुनाव (2021) में इन्हीं क्षेत्रों में 82.17% मतदान हुआ था। इस बार की 11% की बढ़ोतरी राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका रही है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस बार SIR (सस्पेशियस आइडेंटिटी रिमूवल)के तहत लगभग 91 लाख संदिग्ध मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, जिससे कुल मतदाता संख्या घटकर 3.62 करोड़ रह गई। इसके बावजूद, मतदान केंद्रों पर उमड़ी भीड़ ने यह साबित कर दिया कि बंगाल का मतदाता अपने अधिकारों के प्रति कितना सजग है।
प्रमुख बिंदु: वोटिंग के ‘सुपरहिट’ आंकड़े
सर्वाधिक मतदान: 152 सीटों में से अधिकांश क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत 90 के पार रहा।
पिछला रिकॉर्ड: बंगाल का पिछला सर्वश्रेष्ठ 2011 में 84.72% था, जिसे इस बार काफी बड़े अंतर से पार किया गया।
जिलों का प्रदर्शन: पहले चरण के 16 जिलों में से 13 जिलों ने 90% से अधिक मतदान का अविश्वसनीय आंकड़ा छुआ।
दावों की जंग: किसे मिलेगा ‘जनादेश’?
बंपर वोटिंग ने राजनीतिक दलों के बीच ‘दावों का युद्ध’ छेड़ दिया है। जहां भारी मतदान को अक्सर सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) माना जाता है, वहीं कई बार यह मौजूदा सरकार के प्रति भारी समर्थन का संकेत भी होता है।
भाजपा का दावा: पार्टी 152 में से 125 सीटें जीतने का विश्वास जता रही है।
तृणमूल (TMC) का दावा: सत्ताधारी दल का मानना है कि उनकी जन कल्याणकारी योजनाओं के कारण जनता ने 100 से अधिक सीटों पर उनके पक्ष में मुहर लगाई है।
इतनी भारी संख्या में मतदाताओं का बाहर निकलना इस बात का संकेत है कि बंगाल की जनता किसी बड़े विजन या बदलाव के पक्ष में मजबूती से खड़ी है। 91 लाख नामों के कटने के बाद भी 3.62 करोड़ मतदाताओं का यह जोश लोकतंत्र की असली जीत है। अब देखना यह है कि ईवीएम में कैद यह ‘साइलेंट सुनामी’ किसे सत्ता के शिखर पर बैठाती है और किसे विपक्ष की राह दिखाती है।
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