भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को लेकर रेलवे ने एक अहम योजना पर काम शुरू किया है। हरियाणा के जींद-सोनीपत रेल सेक्शन पर चल रही इस ट्रेन में यात्रियों की संख्या उम्मीद के मुताबिक नहीं पहुंच रही है। करीब 2,600 यात्रियों की क्षमता वाली ट्रेन में कई बार सिर्फ 40 से 60 यात्री ही सफर कर रहे हैं। कम यात्री संख्या को देखते हुए रेलवे अब इसके संचालन को अधिक व्यस्त रूट से जोड़ने की योजना पर विचार कर रहा है।
जींद-सोनीपत रूट पर चल रही है ट्रेन
देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन हरियाणा के जींद-सोनीपत सेक्शन पर किया जा रहा है। यह ट्रेन पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण परियोजना मानी जा रही है, क्योंकि इसमें पारंपरिक डीजल इंजन के बजाय हाइड्रोजन आधारित ईंधन सेल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।
ट्रेन को आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल रेल परिवहन की दिशा में एक प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, मौजूदा रूट पर यात्रियों की संख्या कम होने के कारण रेलवे को इसके संचालन को लेकर नए विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।
2,600 की क्षमता, कई बार सिर्फ 40-60 यात्री
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेन की कुल क्षमता करीब 2,600 यात्रियों की है, लेकिन कई यात्राओं में इसमें केवल 40 से 60 यात्री ही सवार हुए। यानी ट्रेन अपनी पूरी यात्री क्षमता के मुकाबले काफी कम यात्रियों के साथ चल रही है।
रेलवे के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी यात्री ट्रेन की उपयोगिता का आकलन यात्रियों की मांग और रूट की व्यस्तता के आधार पर किया जाता है। कम फुटफॉल वाले सेक्शन पर इतनी बड़ी क्षमता वाली ट्रेन चलाने से संसाधनों के इस्तेमाल का सवाल भी उठता है।
दिल्ली तक बढ़ाया जा सकता है रूट
कम यात्री संख्या को देखते हुए रेलवे अब ट्रेन को दिल्ली तक विस्तारित करने की योजना पर विचार कर रहा है। प्रस्तावित विस्तार से हाइड्रोजन ट्रेन को अधिक आबादी और यात्रियों वाले क्षेत्र से जोड़ने की संभावना है।
दिल्ली से जुड़ने पर यात्रियों के लिए ट्रेन की उपयोगिता बढ़ सकती है और इसके संचालन को बेहतर यात्री मांग मिल सकती है। हालांकि, रूट विस्तार, परिचालन व्यवस्था और अन्य तकनीकी पहलुओं को लेकर अंतिम फैसला रेलवे की ओर से किया जाना बाकी है।
हाइड्रोजन ट्रेन क्यों है खास?
हाइड्रोजन ट्रेन को रेलवे के हरित परिवहन अभियान का हिस्सा माना जाता है। हाइड्रोजन ईंधन सेल तकनीक में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली तैयार होती है, जिससे ट्रेन के इलेक्ट्रिक मोटर चलते हैं।
इस प्रक्रिया में पारंपरिक डीजल इंजन की तुलना में कार्बन उत्सर्जन को कम करने की संभावना होती है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में हाइड्रोजन आधारित ट्रेनों को भविष्य के स्वच्छ परिवहन विकल्पों के तौर पर विकसित किया जा रहा है।
सिर्फ यात्री संख्या ही नहीं, तकनीक का भी परीक्षण
हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना का उद्देश्य केवल यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना नहीं है। इसके जरिए रेलवे हाइड्रोजन आधारित रेल तकनीक, परिचालन क्षमता, सुरक्षा व्यवस्था और भविष्य में इसके विस्तार की संभावनाओं का भी आकलन कर रहा है।
भारत में रेलवे लंबे समय से डीजल पर निर्भरता कम करने और रेल परिवहन को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने की दिशा में काम कर रहा है। ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेन को इसी व्यापक बदलाव के एक हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल जींद-सोनीपत रूट पर कम यात्रियों के कारण रेलवे ट्रेन के संचालन को अधिक यात्री वाले क्षेत्र से जोड़ने के विकल्प पर विचार कर रहा है। दिल्ली तक संभावित विस्तार इस परियोजना के लिए महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है।
हालांकि, अंतिम निर्णय रेलवे के परिचालन आकलन और संबंधित मंजूरियों के बाद ही लिया जाएगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रूट में बदलाव के बाद हाइड्रोजन ट्रेन को कितनी यात्री मांग मिलती है और भारत में हाइड्रोजन आधारित रेल परिवहन का भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ता है।






























