INSV Kaundinya: नारियल की रस्सियों और प्राचीन ‘टंकाई’ कला से निर्मित जहाज ने फहराया अरब सागर में जीत का परचम
एक प्राचीन सपने का पुनर्जन्म
कहानी की शुरुआत सितंबर 2023 में गुजरात के ऐतिहासिक पोरबंदर तट से होती है। जहाँ आज की दुनिया विशाल स्टील के जहाजों और आधुनिक इंजनों की बात करती है, वहीं मास्टर शिल्पकार बाबू संकरण और उनके समर्पित कारीगरों ने एक ‘असंभव’ सी लगने वाली चुनौती को स्वीकार किया।
उन्होंने किसी आधुनिक वेल्डिंग या स्टील के ढांचों का उपयोग नहीं किया, बल्कि सदियों पुरानी ‘टंकाई’ (Tankai) पद्धति को अपनाया। इस विधि में लकड़ी के तख्तों को लोहे की कीलों के बजाय नारियल की रस्सियों (Coir rope) से आपस में बुना जाता है। यह शिल्पकारी केवल एक निर्माण नहीं, बल्कि हमारी लुप्त होती विरासत को दी गई एक नई संजीवनी थी।
MoS for Defence Sanjay Seth ceremonially flagged in the Indian Naval Sailing Vessel (INSV) Kaundinya, #INSVKaundinya, in Mumbai Harbour. This marks the successful completion of her maiden overseas voyage to the Sultanate of Oman. @MIB_India @PIB_India #AkashvaniNews… pic.twitter.com/wJSOW4q6Ix
— All India Radio News (@airnewsalerts) March 2, 2026
अजंता की दीवारों से निकलकर लहरों तक
इस जहाज का स्वरूप किसी आधुनिक सॉफ्टवेयर से नहीं, बल्कि 5वीं शताब्दी के इतिहास से लिया गया है। अजंता की गुफाओं में उकेरे गए प्राचीन समुद्री जहाजों के चित्रों को आधार बनाकर इसका नक्शा तैयार किया गया।
जहाज की विशिष्टता:
- लंबाई: 19.6 मीटर
- वजन: 50 टन
- तकनीक: पूरी तरह से सिला हुआ (Stitched Ship)
- प्रेरणा: प्राचीन भारतीय नौसैनिक वैभव
यह विशालकाय ढांचा जब पानी में उतरा, तो वह सिर्फ लकड़ी का गट्ठर नहीं, बल्कि तैरता हुआ भारत का गौरवशाली इतिहास था।
भारतीय नौसेना का नया ‘प्राचीन योद्धा’
21 मई, 2025 भारतीय समुद्री इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन बना। कर्नाटक के कारवार नेवल बेस पर इस जहाज को आधिकारिक रूप से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। केंद्रीय मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इसे हरी झंडी दिखाई। इस जहाज को नाम दिया गया— INSV कौंडिन्य। लेकिन सवाल अब भी वही था: क्या प्राचीन तकनीक आज के अनिश्चित मौसम और विशाल लहरों का मुकाबला कर पाएगी?
ओमान की ऐतिहासिक यात्रा: बिना इंजन के समंदर फतह
असली परीक्षा 29 दिसंबर, 2025 को शुरू हुई। पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक का सफर किसी चुनौती से कम नहीं था।
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| दल | 21 जांबाज नौसैनिकों का समूह |
| साधन | कोई इंजन नहीं, केवल पाल (Sails) और चप्पू (Oars) |
| शक्ति | हवा का रुख और नाविकों का अटूट साहस |
करीब 12 दिनों तक अरब सागर की उत्ताल लहरों से जूझने के बाद, 10 जनवरी, 2026 को INSV कौंडिन्य ने मस्कट के पोर्ट सुल्तान काबूस पर लंगर डाला। इस यात्रा ने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत की प्राचीन इंजीनियरिंग आज भी उतनी ही वैज्ञानिक और भरोसेमंद है।
मुंबई में भव्य वापसी: विरासत और आधुनिकता का संगम
मस्कट में भारत और ओमान के बीच मैत्री संबंधों को मजबूत करने के बाद, यह ‘जीवित सेतु’ अपनी वापसी यात्रा पर निकला। और आज, 2 मार्च, 2026 को मुंबई के तट पर इस जांबाज दल का भव्य स्वागत (Flag-in) किया गया।
INSV कौंडिन्य की यह सफलता केवल एक समुद्री यात्रा नहीं है, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी जड़ों की ओर लौटकर भी भविष्य की राहें तैयार कर सकता है। लकड़ी और रस्सी से बुना यह जहाज हमारी प्राचीन नौसैनिक शक्ति और आधुनिक भारतीय नौसेना के बीच एक गौरवशाली कड़ी बनकर उभरा है।
इतिहास गवाह है कि जिसने समुद्र पर राज किया, उसी ने दुनिया पर राज किया। INSV कौंडिन्य के साथ भारत ने अपनी उस खोई हुई विरासत को फिर से पा लिया है।





























