मुंबई। महाराष्ट्र के शिक्षा क्षेत्र से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था की सुस्ती और संवेदनहीनता को उजागर करती है। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में आदिवासी और अनुसूचित जाति की छात्राओं को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करने वाली ‘उपस्थिति भत्ता योजना’ पिछले 34 वर्षों से महज एक रुपये पर टिकी हुई है। बुधवार को विधान परिषद में विपक्ष द्वारा उठाए गए इस मुद्दे के बाद अब सरकार ने इस भत्ते की राशि में सम्मानजनक बढ़ोतरी के लिए नियोजन विभाग से आग्रह करने का आश्वासन दिया है।
1. 1992 की योजना, 2026 की महंगाई
स्कूली शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे ने सदन में स्वीकार किया कि छात्राओं को शिक्षा के प्रति आकर्षित करने और ड्रॉप-आउट रेट कम करने के लिए वर्ष 1992 में यह योजना शुरू की गई थी।
* नियम: कक्षा पहली से चौथी तक की अनुसूचित जाति (SC), घुमंतु जाति (VJ) और विमुक्त जनजाति (NT) की बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) परिवारों की छात्राओं को प्रतिदिन स्कूल आने पर 1 रुपया दिया जाता है।
* विडंबना: बीते तीन दशकों में महंगाई का स्तर सैकड़ों गुना बढ़ गया, लेकिन शिक्षा विभाग की इस प्रोत्साहन राशि में एक पैसे का भी इजाफा नहीं हुआ।
2. सदन में गूंजी विपक्ष की आवाज
शिवसेना (उद्धव गुट) के विधायक जगन्नाथ अभ्यंकर और कांग्रेस विधायक अभिजीत वंजारी ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए सरकार को घेरा। विधायकों ने सवाल उठाया कि क्या आज के दौर में एक रुपये की कोई क्रय शक्ति (Buying Power) बची है? क्या इतनी कम राशि किसी परिवार को अपनी बेटी को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित कर सकती है?
3. सरकार का पक्ष और आश्वासन
विपक्ष के तीखे सवालों के जवाब में शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे ने कहा कि यह योजना काफी पुरानी है और इसे वर्तमान समय के अनुरूप ढालने की जरूरत है।
छात्राओं का उपस्थिति भत्ता बढ़ाने के संबंध में स्कूली शिक्षा विभाग सकारात्मक है। हम राज्य सरकार के नियोजन (योजना) विभाग से इस राशि को बढ़ाने के लिए विशेष आग्रह करेंगे ताकि यह प्रोत्साहन वास्तविक रूप में छात्राओं के काम आ सके।” — दादाजी भुसे, शिक्षा मंत्री
4. क्यों जरूरी है भत्ते में बढ़ोतरी?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी आर्थिक तंगी के कारण लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है।
* प्रोत्साहन: यदि इस भत्ते को बढ़ाकर 20 से 50 रुपये प्रतिदिन किया जाए, तो यह गरीब परिवारों के लिए एक बड़ा सहारा बन सकता है।
* समानता: यह न केवल उपस्थिति बढ़ाएगा बल्कि समाज के वंचित वर्गों की बच्चियों के बीच शिक्षा के प्रति आत्मविश्वास भी पैदा करेगा।
5. निष्कर्ष: कागजी दावों से इतर जमीनी हकीकत
34 साल तक एक रुपये की राशि का बने रहना यह दर्शाता है कि कल्याणकारी योजनाएं अक्सर सरकारी फाइलों में धूल फांकती रह जाती हैं। अब देखना यह होगा कि मंत्री के आश्वासन के बाद नियोजन विभाग इस प्रस्ताव को कितनी जल्दी मंजूरी देता है और महाराष्ट्र की हजारों छात्राओं को इस ‘महंगाई के दौर’ में वाजिब हक मिल पाता है या नहीं।
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