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गांव में रोजगार नहीं, मुंबई में गटर सफाई: मजबूरी की मार झेलते आदिवासी मजदूरों की कहानी रुला देगी

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मुंबई को अक्सर सपनों का शहर कहा जाता है। हर साल लाखों लोग बेहतर भविष्य की तलाश में इस महानगर का रुख करते हैं। लेकिन इस चमकती हुई मुंबई के पीछे कुछ ऐसी कहानियां भी छिपी हैं, जो विकास और आधुनिकता के दावों पर कई सवाल खड़े करती हैं।

हर साल मॉनसून आने से पहले मुंबई महानगरपालिका शहर को जलभराव से बचाने के लिए हजारों किलोमीटर लंबे नालों और गटरों की सफाई कराती है। इस अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन इस सफाई व्यवस्था की रीढ़ बने मजदूरों की जिंदगी आज भी बदहाल है।

ये मजदूर महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल जिलों और दूरदराज के गांवों से मुंबई आते हैं। इनमें से कई युवा शिक्षित हैं, कुछ ने कॉलेज तक की पढ़ाई भी की है, लेकिन रोजगार के अवसरों की कमी ने उन्हें ऐसी परिस्थितियों में धकेल दिया है जहां उन्हें गटर और नालों में उतरकर मजदूरी करनी पड़ रही है।

गांव में रोजगार नहीं, मजबूरी में मुंबई का रुख

मई और जून की भीषण गर्मी में जब अधिकांश लोग घरों में राहत ढूंढते हैं, तब हजारों आदिवासी मजदूर मुंबई पहुंचते हैं। उनका उद्देश्य साफ होता है – कुछ महीनों की मजदूरी कर अपने परिवार का गुजारा चलाना।

इन मजदूरों को प्रतिदिन 500 रुपये तक की मजदूरी मिलती है। यही कमाई उनके परिवार के लिए जीवनरेखा बन जाती है। इसी से बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयां और घर का राशन चलता है।

मजदूरों का कहना है कि उनके गांवों में रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। खेती पर निर्भरता बढ़ी है, लेकिन अनिश्चित मौसम और आर्थिक संकट के कारण वहां से पर्याप्त आय नहीं हो पाती। ऐसे में मुंबई आकर गटर सफाई का काम करना उनकी मजबूरी बन जाता है।

मुंबई को बचाने वाले खुद बेघर

विडंबना ये है कि जिन मजदूरों की मेहनत मुंबई को बारिश और जलभराव से बचाती है, उन्हीं के पास रहने के लिए सुरक्षित आशियाना नहीं है।

ये आधिवासी मजदूर फुटपाथों पर रात गुजारते हैं। कुछ लोग प्लास्टिक और तिरपाल के नीचे अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रहते हैं। परिवार के साथ आए मजदूरों के लिए स्थिति और भी कठिन होती है।

महिलाएं सड़क किनारे चूल्हा जलाकर खाना बनाती हैं। बच्चे फुटपाथों और सड़क किनारे खेलते या पढ़ाई करते दिखाई देते हैं। बारिश शुरू होने पर इन परिवारों के सामने सिर छुपाने की भी समस्या खड़ी हो जाती है।

पढ़े-लिखे हाथों में गटर सफाई का काम

इस कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू ये है कि इन मजदूरों में कई ऐसे युवा शामिल हैं जिन्होंने स्कूल और कॉलेज तक की पढ़ाई की है। सरकारें शिक्षा को रोजगार का माध्यम बताती हैं, लेकिन इन युवाओं का अनुभव कुछ और कहानी कहता है। डिग्री हासिल करने के बावजूद उन्हें स्थायी रोजगार नहीं मिल सका।

नतीजतन, हाथ में डिग्री होने के बावजूद उन्हें नालों और गटरों की सफाई का काम करना पड़ रहा है। ये केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार व्यवस्था और कौशल आधारित अवसरों की कमी को भी उजागर करता है।

बच्चों का बचपन भी संघर्ष में बीत रहा

गर्मी की छुट्टियां आमतौर पर बच्चों के लिए आनंद और मनोरंजन का समय होती हैं। लेकिन इन मजदूर परिवारों के बच्चों के लिए छुट्टियां संघर्ष का दूसरा नाम हैं। जब दूसरे बच्चे घूमने-फिरने, रिश्तेदारों से मिलने या मनोरंजन में व्यस्त होते हैं, तब ये बच्चे फुटपाथों पर जीवन बिताते हैं। कुछ बच्चे माता-पिता के साथ खाना बनाने में मदद करते हैं, कुछ छोटे भाई-बहनों की देखभाल करते हैं और कई बच्चे अपने माता-पिता को खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हुए देखते हैं।

गरीबी ने इन बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है। उनके सपने और इच्छाएं अक्सर रोजमर्रा की जरूरतों के बोझ तले दब जाती हैं।

45 डिग्री तापमान में जोखिम भरा काम

गटर और नालों की सफाई का काम बेहद कठिन और जोखिम भरा माना जाता है। 42 से 45 डिग्री तापमान में घंटों तक गंदगी, बदबू और प्रदूषण के बीच काम करना इन मजदूरों की दिनचर्या है। कई बार सुरक्षा उपकरण भी पर्याप्त नहीं होते। फटे दस्ताने, पुराने जूते और सीमित सुरक्षा साधनों के साथ मजदूरों को काम करना पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे कार्यों में संक्रमण, त्वचा रोग, श्वसन संबंधी बीमारियां और दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बना रहता है।

सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी

मजदूरों का कहना है कि बीमार पड़ने या दुर्घटना होने की स्थिति में उनके सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं, बीमा और आपातकालीन सहायता की पर्याप्त जानकारी या पहुंच नहीं मिल पाती। गटर सफाई के दौरान हर साल कई हादसों की खबरें सामने आती हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों की समस्याएं अक्सर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा नहीं बन पातीं।

मजदूरों की छोटी-सी उम्मीद

इन मजदूरों की मांगें बहुत बड़ी नहीं हैं। वे केवल बेहतर मजदूरी, सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं और सम्मानजनक व्यवहार चाहते हैं। उनका कहना है कि वे किसी भी प्रकार का मेहनत वाला काम करने को तैयार हैं, बस उन्हें अवसर मिलना चाहिए। वे दान या सहायता नहीं मांग रहे, बल्कि अपने श्रम के बदले सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर चाहते हैं।

विकास के पीछे छिपा दूसरा सच

मुंबई की बारिश से पहले होने वाली तैयारियों में इन मजदूरों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल ये है कि क्या शहर की व्यवस्था उन लोगों के जीवन को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने की जिम्मेदारी भी निभा रही है, जो इस व्यवस्था को अपने श्रम से चलाते हैं?

मुंबई के नाले हर साल साफ हो जाते हैं। सड़कें जलभराव से बच जाती हैं। लेकिन इन मजदूरों के जीवन से संघर्ष, असुरक्षा और गरीबी कब दूर होगी? ये सवाल आज भी जवाब का इंतजार कर रहा है।

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