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क्या सचमुच Pandit Nehru की राख खेतों में बिखेरी गई थी? जानिए उनकी वसीयत का ऐतिहासिक सच

Pandit Nehru
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भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pandit Nehru) के जीवन से जुड़ा एक ऐसा ऐतिहासिक तथ्य है, जिसकी चर्चा आज भी समय-समय पर होती रहती है। अक्सर ये सवाल पूछा जाता है कि क्या सचमुच उनकी मृत्यु के बाद उनकी राख देशभर के खेतों में बिखेरी गई थी? इसका जवाब है – हां, और ये उनकी अपनी लिखित वसीयत के अनुसार किया गया था।

1954 में लिखी थी अपनी अंतिम इच्छा

पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pandit Nehru) ने 21 जून 1954 को अपनी वसीयत लिखी थी। इस वसीयत में उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद अस्थियों के विसर्जन को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए थे। नेहरू चाहते थे कि उनकी अस्थियों का एक छोटा हिस्सा प्रयागराज में गंगा नदी में प्रवाहित किया जाए, जबकि शेष राख को भारत के खेतों में बिखेर दिया जाए।

उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा था कि वे चाहते हैं कि उनकी राख भारत की मिट्टी और धूल में मिल जाए, ताकि वे उस धरती का हिस्सा बन सकें जहां देश के किसान मेहनत करते हैं और राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं।

27 मई 1964 को हुआ था निधन

27 मई 1964 को पंडित नेहरू (Pandit Nehru) का निधन हुआ। उनके निधन के बाद सरकार और परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए वसीयत में लिखे निर्देशों को पूरा किया।

अस्थियों का एक हिस्सा प्रयागराज में गंगा नदी में प्रवाहित किया गया। इसके बाद 11 जून 1964 को भारतीय वायुसेना के विशेष विमानों के जरिए उनकी राख को देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाया गया और खेतों के ऊपर से बिखेरा गया।

किसानों और भारत की मिट्टी से था गहरा लगाव

नेहरू का मानना था कि भारत की असली पहचान उसके गांवों और किसानों से है। उनकी अंतिम इच्छा केवल एक धार्मिक या पारिवारिक परंपरा नहीं थी, बल्कि ये भारत की भूमि, किसानों और देश की संस्कृति के प्रति उनके गहरे सम्मान और जुड़ाव का प्रतीक थी।

वे चाहते थे कि मृत्यु के बाद भी उनका अस्तित्व भारत की मिट्टी में समाहित हो जाए और वे उस धरती का हिस्सा बने रहें, जिसने उन्हें पहचान और सम्मान दिया।

भारतीय इतिहास की अनोखी घटना

विश्व इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं, जब किसी राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री ने अपनी अस्थियों को पूरे देश के खेतों में बिखेरने की इच्छा व्यक्त की हो। यही कारण है कि नेहरू की ये वसीयत भारतीय इतिहास की सबसे अनोखी और चर्चित घटनाओं में गिनी जाती है।

11 जून 1964 को भारतीय वायुसेना द्वारा उनकी राख को खेतों में बिखेरने की घटना केवल एक अंतिम संस्कार प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि ये देश और उसके किसानों के प्रति उनके भावनात्मक संबंध का प्रतीकात्मक संदेश भी थी।

आज भी चर्चा में क्यों रहती है ये घटना?

नेहरू की वसीयत और उनकी अंतिम इच्छा आज भी इतिहासकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती है। ये घटना बताती है कि देश के पहले प्रधानमंत्री स्वयं को भारत की मिट्टी, किसानों और आम जनता से कितना जुड़ा हुआ मानते थे।

उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए जिस तरह उनकी राख को खेतों में बिखेरा गया, वे भारतीय इतिहास के उन दुर्लभ अध्यायों में शामिल है, जो एक नेता और उसके देश के बीच गहरे संबंध को दर्शाते हैं।

ये पूरी तरह सत्य है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pandit Nehru) की वसीयत के अनुसार उनकी अस्थियों का एक हिस्सा गंगा नदी में प्रवाहित किया गया था और शेष राख को भारतीय वायुसेना के विमानों द्वारा देशभर के खेतों में बिखेरा गया था। ये कदम उनकी उस इच्छा का प्रतीक था, जिसमें वे मृत्यु के बाद भी भारत की मिट्टी और किसानों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बने रहना चाहते थे।

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