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Election King: कौन हैं ‘चुनाव राजा’? 245 चुनाव लड़ चुके शख्स जो केवल हारने के लिए खड़े होते हैं

Election King: कौन हैं ‘चुनाव राजा’? 245 चुनाव लड़ चुके शख्स जो केवल हारने के लिए खड़े होते हैं
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भारत में राजनीतिक इतिहास कई अनोखे और रोचक व्यक्तित्वों से भरा है, परंतु जब हम चुनाव हारने के लिए ही चुनाव लड़ने वाले शख्सियत की बात करते हैं, तो एक नाम तुरंत ध्यान में आता है: चुनाव राजा (Election King) पद्मराजन। तमिलनाडु के मट्टूर गांव से ताल्लुक रखने वाले के.के. पद्मराजन ने देश के इतिहास में अपना नाम एक अनोखे तरीके से दर्ज किया है।

उन्होंने 245 से अधिक चुनाव लड़े और सभी में हार का सामना किया। सबसे असफल उम्मीदवार पद्मराजन (Most Unsuccessful Candidate Padmarajan), जैसा कि लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में उन्हें दर्ज किया गया है, एक ऐसी शख्सियत हैं जो केवल अपनी हार के लिए ही प्रसिद्ध हैं।

शुरुआत से चुनाव मैदान में, सिर्फ हार का मकसद

पद्मराजन की कहानी एक साधारण से टायर मरम्मत दुकान के मालिक से चुनावों के ‘राजा’ बनने की है। वे हर बार चुनावों में किसी महत्वपूर्ण या प्रसिद्ध नेता के खिलाफ खड़े होते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य कभी जीतना नहीं होता। उनका दावा है कि उन्होंने अब तक 80 लाख रुपए से अधिक की जमानत जब्त कराई है। चुनाव राजा (Election King) हर बार जोर-शोर से नामांकन दाखिल करते हैं, जिसमें उनकी जेब से भारी-भरकम खर्च होता है। इतना ही नहीं, वे प्रत्येक चुनाव में यह साफ़-साफ़ अपने समर्थकों से कहते हैं कि वे उन्हें वोट न दें। फिर भी उनका जुनून ऐसा है कि हर चुनाव में खड़े होते हैं और अपनी हार की परंपरा को कायम रखते हैं।

1988 में उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा और तब से लेकर आज तक वे एक अनोखी रिकॉर्ड बना चुके हैं। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स दोनों ही में वे दर्ज हैं क्योंकि उन्होंने सबसे अधिक चुनाव लड़े हैं और सबसे अधिक बार हार का सामना किया है। इसी वजह से उन्हें भारत के सबसे असफल उम्मीदवार पद्मराजन (Most Unsuccessful Candidate Padmarajan) के नाम से जाना जाता है।

अटल से लेकर मनमोहन तक के खिलाफ लड़ चुके हैं चुनाव

पद्मराजन ने अपने राजनीतिक सफर में कई दिग्गजों का सामना किया है। उन्होंने तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों – अटलबिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिंहराव और मनमोहन सिंह के खिलाफ चुनाव लड़े हैं। इतना ही नहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ वायनाड से चुनाव लड़ा था। हालांकि, वे 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ सके, परंतु फिर भी दो संसदीय सीटों – केरल के त्रिशूर और तमिलनाडु के धर्मपुरी से उन्होंने मैदान में उतरने का फैसला किया। यह सब करते हुए, उन्होंने लाखों की जमानत राशि जब्त कराई, फिर भी उनका इरादा कायम है कि वे हर चुनाव में हारते हुए अपनी पहचान बरकरार रखें।

उनकी इस अनोखी आदत और हौसले की वजह से उन्हें चुनाव राजा (Election King) की उपाधि मिली है। भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो चुनावी राजनीति में इतने लंबे समय तक टिका रहा हो और हर बार अपनी हार को लेकर हंसता हो। उनका कहना है कि वे हर चुनाव में इसलिए खड़े होते हैं ताकि उनकी हार से समाज को एक सन्देश मिल सके। उनका उद्देश्य लोगों का ध्यान चुनावों में खर्च होने वाले भारी धनराशि की ओर भी दिलाना है, जो अक्सर चुनावी प्रचार में बर्बाद हो जाता है।

अनोखी शख्सियत और चुनावों से जुड़ी रोचक कहानियां

पद्मराजन केवल एक टायर मरम्मत की दुकान के मालिक ही नहीं, बल्कि वे खुद को होम्योपैथिक डॉक्टर भी मानते हैं। उनका चुनाव लड़ने का यह जुनून एक मिशन की तरह है, जिसमें वे जीतने का इरादा कभी नहीं रखते। एक बार उनसे सवाल किया गया कि वह हर बार चुनाव क्यों लड़ते हैं और हारना क्यों चाहते हैं, तो उन्होंने हंसते हुए कहा, “मेरा सपना है कि जब तक जिंदा रहूं, तब तक हर चुनाव में खड़ा होऊं और लोगों से कहूं कि मुझे वोट न दें।”

तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक, पद्मराजन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उन्होंने पंचायत चुनाव, नगरपालिका चुनाव, विधानसभा चुनाव और यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव में भी हिस्सा लिया है। एक अनुमान के अनुसार, उन्होंने 6 बार राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन किया है, 6 बार उप-राष्ट्रपति पद के लिए, 32 बार लोकसभा के लिए, और 50 बार राज्यसभा के लिए। हर चुनाव में उनके नामांकन की कहानी अनोखी होती है और हर बार वे एक अलग अंदाज में अपने समर्थकों को जागरूक करते हैं कि कैसे चुनावों में खर्च किए जाने वाले पैसे का सदुपयोग किया जा सकता है।

चुनावों में हार के प्रति उनके इस जज्बे को देखकर कई लोग उन्हें प्रेरणादायक मानते हैं। भारत के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने इस तरह से राजनीति में अपनी अनोखी पहचान बनाई हो। सबसे असफल उम्मीदवार पद्मराजन (Most Unsuccessful Candidate Padmarajan) का यह सफर केवल हार का सफर नहीं है बल्कि यह भारत की राजनीति में एक मिसाल भी है कि जीतने के लिए ही नहीं, बल्कि हारने के लिए भी जज्बा चाहिए होता है।

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