जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन इस दर्दनाक घटना की यादें आज भी पीड़ित परिवारों के दिलों में ताजा हैं। ये हमला केवल एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए ऐसी त्रासदी बन गया, जिसने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
सुकून भरी वादियों में मची थी चीख-पुकार
हमले के समय बैसरन घाटी में मौजूद पर्यटक प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले रहे थे। कोई तस्वीरें ले रहा था तो कोई अपने परिवार के साथ खुशियों के पल बिता रहा था। लेकिन अचानक गोलियों की आवाज ने इस शांत माहौल को दहशत में बदल दिया। आतंकवादियों ने बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें कई निर्दोष लोगों की जान चली गई।
महिलाओं के सामने उजड़ गए परिवार
इस हमले का सबसे दर्दनाक पहलू ये रहा कि कई महिलाओं ने अपनी आंखों के सामने अपने पतियों और बेटों को खो दिया। ये दृश्य उनके मन में आज भी गहरे जख्म की तरह मौजूद है, जिससे उबर पाना उनके लिए बेहद मुश्किल हो रहा है।
चंद्रमौली की कहानी: एक अधूरी यात्रा
इस हमले में विशाखापत्तनम के 68 वर्षीय रिटायर्ड बैंक अधिकारी चंद्रमौली भी शामिल थे, जो अपनी पत्नी नागमणि के साथ कश्मीर घूमने आए थे। उनकी यह यात्रा खुशियों से भरी होनी थी, लेकिन 22 अप्रैल को बैसरन घाटी में अचानक हुई फायरिंग ने सब कुछ बदल दिया।
बताया जाता है कि गोलियों की आवाज सुनते ही चंद्रमौली ने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन आतंकवादियों ने उनका पीछा कर उन्हें गोली मार दी। यह पूरी घटना उनकी पत्नी और साथियों की आंखों के सामने हुई, जिसने सभी को गहरे सदमे में डाल दिया।
परिवारों पर आज भी भारी है सदमा
हमले के बाद जब चंद्रमौली का पार्थिव शरीर उनके शहर पहुंचा, तो पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। उनके साथ यात्रा पर गए लोग आज भी उस दिन को याद कर सहम जाते हैं। कई परिवार आज भी मानसिक आघात और डर के साए में जी रहे हैं।
मानसिक असर और डर का साया
हमले के बाद बचे लोग पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। तेज आवाज सुनकर घबरा जाना, उस दिन की यादें बार-बार आना और भीड़भाड़ वाली जगहों से डर लगना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।
सरकार की कार्रवाई, लेकिन दर्द बरकरार
हमले के बाद भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए जवाबी कार्रवाई की। हालांकि इस कदम ने आतंकियों को करारा जवाब दिया, लेकिन जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनका दर्द आज भी कम नहीं हुआ है।
कब खत्म होगा आतंक का साया?
पहलगाम की ये घटना आज भी कई सवाल खड़े करती है। आखिर कब तक निर्दोष लोग आतंक का शिकार बनते रहेंगे? कब घाटियों में फिर से सुकून लौटेगा और गोलियों की जगह केवल प्रकृति की आवाज सुनाई देगी?
ये त्रासदी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उन अनगिनत अधूरी कहानियों का हिस्सा है, जिनके अपने कभी वापस नहीं लौटे।
ये भी पढ़ें: भारत के सी-फूड निर्यात में उछाल: चीन बना सबसे बड़ा खरीदार, सरकार की रणनीति रंग लाई

























